संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 91, कुल 770 में से
संदर्भ में पढ़ें* पूर्वभाग-प्रथम पाद * ८९
और तीनों समय पूजा करे। फिर प्रातःकालका शौच, स्नान आदि कर्म पूरा करके पुनः भगवान् गोविन्दकी पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् वस्त्र और दक्षिणासहित एक आढक (चार सेर) धान ब्राह्मणको दे और निम्नाङ्कित मन्त्रका पाठ करे—
नमो गोविन्द सर्वेश गोपिकाजनवल्लभ॥
अनेन धान्यदानेन प्रीतो भव जगद्गुरो।
(ना० पूर्व० १७। ४१-४२)
'गोविन्द! सर्वेश्वर! गोपाङ्गनाओंके प्राणवल्लभ! जगद्गुरो! इस धान्यके दानसे आप मुझपर प्रसन्न हों।'
इस प्रकार भलीभाँति व्रतका पालन करके मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है और महान् यज्ञका पूरा पुण्य प्राप्त कर लेता है।
चैत्र मासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिको उपवास करके पहले बताये अनुसार 'नमोऽस्तु विष्णवे तुभ्यम्'—इस मन्त्रसे भगवान्की पूजा करे। पूर्ववत् एक सेर दूधसे भगवान् विष्णुको स्नान करावे। विप्रवर! यदि शक्ति हो तो उसी प्रकार सेरभर घीसे भी आदरपूर्वक भगवान्को नहलावे तथा रातमें भी पहलेकी तरह जागरण और पूजन करे। तदनन्तर सबेरे उठकर प्रातः-कालके आवश्यक कर्म पूरा करके मधु, घी और तिलमिश्रित हवन-सामग्रीकी एक सौ आठ आहुति दे। उसके बाद ब्राह्मणको दक्षिणासहित एक आढक (चार सेर) चावल दान करे। (मन्त्र इस प्रकार है—)
प्राणरूपी महाविष्णुः प्राणदः सर्ववल्लभः॥
तण्डुलाढकदानेन प्रीयतां मे जनार्दनः।
(१७। ४७-४८)
'भगवान् महाविष्णु प्राणस्वरूप हैं। वे ही सबके प्रियतम और प्राणदाता हैं। इस एक आढक चावलके दानसे वे भगवान् जनार्दन मुझपर प्रसन्न हों।'
इस प्रकार भक्तिभावसे व्रतका पालन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है और अत्यग्निष्टोम यज्ञके आठगुने फलको पाता है।
वैशाख शुक्ला द्वादशीको उपवास करके भक्तिपूर्वक देवेश्वर मधुसूदनको द्रोण (कलश) परिमित दूधसे स्नान करावे तथा रातमें तीन समय पूजन करते हुए जागरण करे। मधुसूदनकी विधिपूर्वक पूजा करके 'नमस्ते मधुहन्त्रे'—इस मन्त्रसे घीकी एक सौ आठ आहुतिका होम करे। घीका उपयोग अपनी शक्तिके अनुसार करे। इससे पापरहित होकर मनुष्य आठ अश्वमेध यज्ञोंका फल पाता है।
ज्येष्ठ मासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिको उपवास करके एक आढक (चार सेर) दूधसे भगवान् त्रिविक्रमको स्नान करावे और 'नमस्त्रिविक्रमाय' इस मन्त्रसे भक्तिपूर्वक भगवान्का पूजन करे। खीरकी एक सौ आठ आहुति देकर होम करे। फिर रातमें जागरण करके भगवान्की पूजा करे। फिर प्रातःकृत्य करके पूजनके पश्चात् ब्राह्मणको दक्षिणासहित बीस पूआ दान करे। (दानका मन्त्र इस प्रकार है—)
देवदेव जगन्नाथ प्रसीद परमेश्वर॥
उपायनं च संगृह्य ममाभीष्टप्रदो भव।
(ना० पूर्व० १७। ५५-५६)
'देवदेव! जगन्नाथ! परमेश्वर! आप मुझपर प्रसन्न होइये और यह भेंट ग्रहण करके मेरे अभीष्टकी सिद्धि कीजिये।'
तत्पश्चात् यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन करावे और उसके बाद स्वयं भी मौन होकर भोजन करे। ब्रह्मन्! जो इस प्रकार भगवान् त्रिविक्रमका व्रत करता है, वह निष्पाप हो आठ यज्ञोंका फल पाता है।
आषाढ़ शुक्ला द्वादशीको उपवास-व्रत करनेवाला जितेन्द्रिय पुरुष पूर्ववत् एक आढक (चार सेर)