भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

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ऋणराशि का पांच प्रतिशत दण्ड वसूल करना चाहिए तथा उससे उत्तमर्ण को मूलधन और ब्याज का भुगतान कराना चाहिए। स्ववाक् सम्प्रतिपत्तौ तु ऋणिकं दशकं शतम्। विनयं दापयेद्राजा द्विगुणं तु पराजितम्॥ 133॥ यदि ऋणी के समर्थ होने पर, ऋण लौटाने को प्रस्तुत न होने पर व उत्तमर्ण द्वारा राजा (प्रशासन) से न्याय की गुहार किये जाने पर अधमर्ण ऋण लेना और लौटाना स्वीकार कर लेता है, तो उससे ऋण-राशि का दस प्रतिशत दण्ड वसूल करके उत्तमर्ण को उसका मूलधन और ब्याज दिलाना चाहिए। ऋणकर्ता के ऋण लेने को नकारने पर और प्रमाण आदि साक्ष्य से विवाद में झूठा सिद्ध हो जाने पर पराजित ऋणी से बीस प्रतिशत दण्ड वसूल करना चाहिए और उत्तमर्ण को उसका मूलधन और ब्याज दिलाना चाहिए। न स्याद् द्रव्यपरीमाणं कालेनेहार्णिकस्य चेत्। जातिसंज्ञाधिवासानामागमो लेख्यतः स्मृतः॥ 134॥ यदि पराजित ऋणकर्ता ऋण को चुकाने में समर्थ नहीं है, उसके पास चल- अचल सम्पत्ति नहीं है, तो न्यायाधिकरण को उसका पूरा निवास-स्थल, जाति, नाम तथा गोत्र आदि के उल्लेख के साथ शपथ-पत्र लिखा लेना चाहिए कि वह अथवा उसके वंशज ऋणदाता को अथवा उसके वंशजों को सामर्थ्य आते ही ब्याज सहित ऋण-राशि चुकता करने को वचनबद्ध हैं-यह न्यायाधिकरण की व्यवस्था है। लेख्यं तु द्विविधं ज्ञेयं स्वहस्तान्यकृतं तथा। असाक्षिमत्साक्षिमच्च सिद्धिर्देशस्थितेस्तयोः ॥ 135॥ सामर्थ्य आने पर उत्तमर्ण को ऋण लौटाने के शपथ-पत्र के दो रूप हैं-

  1. अधमर्ण द्वारा स्वयं अपने हाथ से लिखा और हस्ताक्षरित तथा 2. दूसरे व्यक्ति द्वारा लिखा गया और अधमर्ण द्वारा हस्ताक्षरित। देश और स्थिति के आधार पर इन दोनों के पुनः दो रूप हैं- 1. साक्षी द्वारा सत्यापित तथा 2. साक्ष्य-रहित। उल्लेखनीय यह है कि दोनों-उत्तमर्ण तथा अधमर्ण-की सन्तुष्टि और विश्वास-भावना को ध्यान में रखते हुए, दोनों को एक-समान मान्य शपथ-पत्र ही अपनाना चाहिए। यही उचित एवं न्याय-संगत है। यदि दोनों साक्ष्य की आवश्यकता नहीं समझते, एक दूसरे के प्रति विश्वास का भाव रखते हैं, तो ठीक है, परन्तु यदि एक भी पक्ष साक्ष्य की आवश्यकता समझता है, तो साक्ष्य का होना आवश्यक हो जाता है। देशाचाराविरुद्धं यद् व्यक्तावधिविलक्षणम्। तत्प्रमाणे स्मृतं लेख्यमविप्लुतक्रमाक्षरम् ॥ 136 ॥ निम्नोक्त गुणों वाला दस्तावेज़ वैध एवं प्रमाणित माना जाता है-जो साफ़ नारदस्मृति / 99