नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 103, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंबन्धक रखी गयी जिस सम्पत्ति का उपभोग ऋणदाता नहीं कर सकता, ऐसी वस्तु को बन्धक रखने की कोई सार्थकता ही नहीं है। दर्शितं प्रतिकालं यत् प्रार्थितं श्रावितं तथा। लेख्यं सिद्ध्यति सर्वत्र मृतेष्वपि हि साक्षिषु ॥ 140 ॥ यदि समय-समय पर ऋणदाता द्वारा ऋणकर्ता से अपने ऋण की मांग की जाती रही है, उसे तथा उसके परिवारजनों को ऋण-पत्र दिखाया जाता रहा है, ऋण-पत्र की शर्तों से उसे अवगत कराया जाता रहा है, तो उस स्थिति में साक्षियों के मर जाने पर भी ऋण-पत्र की वैधता स्थिर रहती है, वह किसी भी स्तर पर निरस्त नहीं होता है, अर्थात् साक्षियों के न रहने पर ऋणकर्ता ऋण देने से मुकर नहीं सकता है। अदृष्टार्थमश्रुतार्थं व्यवहारार्थमागतम्। न लेख्यं सिद्धिमाप्नोति जीवत्स्वपि हि साक्षिषु ॥ 141 ॥ ऋणकर्ता, ऋणदाता और साक्षियों के जीवनकाल में ऋणकर्ता के वयस्क पुत्रों अथवा उत्तराधिकारियों को उनके पिता द्वारा किये गये किसी अनुबन्ध अथवा लिखे गये किसी ऋण पत्र की कोई जानकारी न देने पर, ऋणकर्ता आदि के दिवंगत हो जाने पर उसके पुत्रों की कोई देनदारी नहीं बनती। अभिप्राय यह है कि ऋणदाता को ऋणकर्ता के पुत्रों को भी उनके पिता के ऋणी होने की यथोचित जानकारी करानी चाहिए तथा आवश्यक होने पर ऋण पत्र भी दिखाना चाहिए, ताकि पिता के मर जाने पर व उसकी सम्पत्ति पर अधिकार करते समय वे ऋण के शोधन के दायित्व को भी न भूलें। लेख्ये देशान्तरन्यस्ते दग्धे दुर्लिखिते हृते। सतस्तत्कालहरणमसतो दृष्टदर्शनम् ॥ 142 ॥ ऋणदाता के विदेश चले जाने के कारण किसी दस्तावेज़ के खो जाने पर, किसी दुर्घटनावश जल जाने पर, काग़ज़ के पुराना पड़ जाने से फट जाने पर अथवा काग़ज़ के गल जाने से अपाठ्य एवं अवाच्य बन जाने पर, दस्तावेज़ को देखने- सुनने वालों, अर्थात् अनुबन्ध की जानकारी रखने वालों की सहायता से नया ऋण- पत्र तैयार करने और न्यायालय में उपस्थित करने के लिए ऋणदाता को पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए। यत्र स्यात् संशयो लेख्ये भूताभूतकृते क्वचित्। तत्स्वहस्तक्रियाचिह्न युक्तिप्राप्तिभिरुद्धरेत् ॥ 143 ॥ किसी ऋण पत्र के वास्तविक अथवा अवास्तविक होने का सन्देह उत्पन्न हो जाने पर ऋणकर्ता के हस्ताक्षरों का मिलान करने से, साक्षियों के साक्ष्य से तथा उनके द्वारा विहित हस्ताक्षरों की जांच-परख से, अनुबन्ध तैयार करने वाले लेखक नारदस्मृति / 101