नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 106
- प्राङ्-विवाक — धर्म से सम्बन्धित विवाद में शास्त्र के साक्ष्य को उद्धृत करने वाला धर्माधिकारी।
- राजा — न्यायाधिकारियों अथवा प्रशासकों की उपस्थिति में घटित घटना का साक्ष्य प्रशासन ही होता है।
- सम्बद्ध व्यक्ति — कार्य-विशेष के लिए नियुक्त अथवा प्रेरित व्यक्ति, दास, मित्र, बन्धु अथवा अन्य कोई परिचित-अपरिचित व्यक्ति।
- भीतरी व्यक्ति — घर का कोई मूकदर्शक व्यक्ति तथा
- वंश का व्यक्ति — विवाद की जानकारी रखने वाला। उपर्युक्त छह व्यक्ति साक्षी के रूप में मनोनीत तो नहीं किये जाते, फिर भी साक्षी बन सकते हैं। कुलीना ऋजवः शुद्धा जन्मतः कर्मतोऽर्थतः। त्र्यवराः साक्षिणोऽनिन्द्याः शुचयः शुद्धबुद्धयः ॥ 153 ॥ निम्नोक्त गुणों से सम्पन्न एक, दो अथवा तीन व्यक्तियों को साक्षी बनाना चाहिए—1. कुलीन, अर्थात् उच्च कुलोत्पन्न, 2. ऋजु, अर्थात् स्वभाव से सरल, छल कपट रहित, 3. जन्म से पवित्र आचरण वाले, उत्तम आजीविका वाले तथा कर्म से नितान्त शुद्ध-पवित्र, अर्थात् लोभरहित। 4. अनिन्दित, अर्थात् लोक में प्रतिष्ठित एवं कीर्तिमान्, 5. शुद्ध बुद्धि, अर्थात् विचारों की उच्चता के साथ शुद्ध आचरण वाले। ब्राह्मणाः क्षत्रियाः वैश्याः शूद्रा ये चाप्यनिन्दिताः । प्रतिवर्णं भवेयुस्ते सर्वे सर्वेषु वास्मृताः ॥ 154 ॥ अनिन्दित चरित्र एवं शुद्ध आचरण वाले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र अपने-अपने वर्ण और अपनी-अपनी जाति के लोगों के साक्षी बन जाते हैं। वस्तुतः अपने वर्ण-जाति के लोगों को ही साक्षी बनाना अच्छा रहता है। श्रेणीषु श्रेणीपुरुषाः स्वेषु वर्गेषु वर्गिणः। बहिर्वासिषु बाह्याः स्युः स्त्रियः स्त्रीषु च साक्षिणः ॥ 155 ॥ श्रेणियों के विवादों में श्रेणी पुरुषों का, वर्गों के विवादों में वर्ग के पुरुषों का बाह्य क्षेत्रों के विवादों में बाहरी लोगों का तथा स्त्रियों के विवादों में स्त्रियों का साक्षी होना ही वाञ्छनीय रहता है; क्योंकि अपनी जाति वालों में एक प्रकार से प्रकृतिगत एकात्मकता रहती है। श्रेण्यादिषु च सर्वेषु कश्चिच्चेद् द्वेष्यतामियात्। तेभ्य एव न साक्ष्यं स्याद् द्वेष्टारः सर्व एव ते ॥ 156 ॥ श्रेणी अथवा वर्ग आदि के विवादों में साक्षी रहने वाले व्यक्ति के द्वेषग्रस्त, अथवा पूर्वाग्रह से युक्त हो जाने पर उसकी साक्षी बनने की पात्रता समाप्त हो जाती है। साक्षी का तटस्थ होना उसकी अनिवार्य योग्यता है। उसे तो अपने कानों से सुने 104 / नारदस्मृति