नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 109, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंआधर्यं पूर्वपक्षस्य यस्मिन्नर्थवशाद्भवेत्। विवादे साक्षिणस्तत्र प्रष्टव्याः प्रतिवादिनः ॥ 164 ॥ वादी के साक्षियों के साक्ष्य के दोषपूर्ण, अविश्वसनीय तथा असत्य प्रतीत होने पर प्रतिवादी के साक्षियों के साक्ष्य को अवश्य महत्त्व देना चाहिए। न परेण समुद्दिष्टमुपेयात् साक्षिणं रहः । भेदयेत्तं न चान्येन हीयेतेवं समाचरन् ॥ 165 ॥ दोनों—वादी और प्रतिवादी—को एक दूसरे द्वारा घोषित एक दूसरे के साक्षियों के साथ न तो एकान्त में गुप्त वार्तालाप करना चाहिए और न ही उन्हें तोड़ने अथवा अपने पक्ष में करने का प्रयास करना चाहिए। प्रशासन को इस प्रकार की कुचेष्टा— दूसरे के साक्षियों को तोड़ना—करने वाले पक्ष को पराजित घोषित कर देना चाहिए। साक्ष्युद्दिष्टो यदि प्रेयाद् गच्छेद्वपि दिगन्तरम् । तच्छ्रोतारः प्रमाणं स्युः प्रमाणं ह्युत्तरा क्रिया ॥ 166 ॥ विधिशास्त्र में उत्तरक्रिया की प्रामाणिकता का स्वरूप इस प्रकार निर्दिष्ट है— उद्दिष्ट साक्षी के मर जाने पर अथवा विदेश दूर देश को चले जाने पर उसकी अनुपस्थिति में उसके मुख से सुने वचन को तद्वत् उद्धृत करने वाले उसके किसी निकट सम्बन्धी अथवा मित्र आदि को स्थानापन्न साक्षी के रूप में मान्य करना चाहिए। सुदीर्घेणापि कालेन लिखितः सिद्धिमाप्नुयात् । आत्मनैव लिखेज्जानन्नचेदन्येन लेखयेत् ॥ 167 ॥ लेन-देन के मामले में बहुत समय बीत जाने पर भी लिखित प्रमाण के उपलब्ध होने पर वसूली की जा सकती है और इनकार करने पर मुक़द्दमा चलाया जा सकता है। यदि व्यक्ति जानकार है, तो स्वयं भी लेन देन के व्यवहार को लिपिबद्ध कर सकता है और यदि विधि-मान्य भाषा के प्रयोग की अभिज्ञता नहीं, तो विधि द्वारा स्थापित लेखक से लिखाया जा सकता है। दोनों प्रकार के दस्तावेज़— अपने आप लिखा तथा दूसरे से लिखाया गया—समान रूप से मान्य होते हैं। आष्टमाद्वत्सरात्सिद्धिः स्मारितस्येह साक्षिणः । आ पञ्चमात्तथा सिद्धिर्यदृच्छोपगतस्य च ॥ 168 ॥ साक्षी के रूप में एक बार उद्दिष्ट व्यक्ति आठ वर्षों तक मनोनीत करने वाले पक्ष के द्वारा मान्य माना जाता है। कार्यस्थल पर उपस्थित और प्रशासन द्वारा साक्ष्य के लिए आहूत व्यक्ति भी पांच वर्षों तक साक्ष्य देने के लिए अभिमत माना जाता है। आ तृतीयात्तथा वर्षात् सिद्धिर्गूढस्य साक्षिणः । आ संवत्सरात्ः सिद्धिर्वदन्त्युत्तरसाक्षिणः ॥ 169 ॥ नारदस्मृति / 107