भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 304 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 119

उनके कठोर पाशों में बंधा विषम दुःख भोगता है। इस अवधि के उपरान्त भी वह पाशमुक्त होने के लिए स्त्री की योनि में उत्पन्न होकर पराधीनता के कष्टपूर्ण जीवन को बिताने पर विवश होता है। एवं सम्बन्धनात् तस्मान्मुच्यते नियताच्च सः। पशुगोऽश्वपुरुषाणां हिरण्यं भूर्यथाक्रमम्॥ २०६॥ पशु—गौ, अश्व—आदि, मनुष्य, स्वर्ण तथा भूमि सम्बन्धी विवाद में मिथ्या- साक्ष्य के लिए मनुष्य को परलोक में कौन-कौन से दण्ड भुगतने पड़ते हैं—इसकी चर्चा अगले पद्यों में की जा रही है। इतना तो निश्चित ही है कि मिथ्यासाक्षी वरुणदेव के पाशों में बंधकर दीर्घकाल तक असह्य वेदना का शिकार बनता है। यावतो बान्धवांस्तस्मिन् हन्ति साक्ष्येऽनृतं वदन्। तावतः सम्प्रवक्ष्यामि शृणु सौम्यानुपूर्वशः॥ २०७॥ मिथ्यासाक्षी अपने पाप से अपने वंश के कितने पूर्वजों को, किस प्रकार कलंकित करता है, उन्हें नरक-यातना सहन करने का उत्तरदायी बनाता है, इसका विवरण कुछ इस प्रकार से है— पञ्च पश्वनृते हन्ति दश हन्ति गवानृते। शतमश्वानृते हन्ति सहस्रं पुरुषानृते॥ २०८॥ बकरी आदि पशु सम्बन्धी विवाद में मिथ्या-साक्ष्य देने के अपराध के दण्ड के रूप में उसके पांच बान्धवों—माता, पिता, पत्नी, सन्तान तथा स्वयं वह—की मृत्यु हो जाती है। गाय के विषय में मिथ्या-साक्ष्य का दण्ड तो दस बान्धवों—पांच वर्तमान—माता, पिता आदि तथा पांच पूर्वपुरुषों—को भुगतना पड़ता है। अश्व के विवाद में झूठी गवाही का दण्ड सौ सम्बन्धियों का पतन तथा पुरुष—दास, स्त्री आदि—के विवाद में मिथ्या-साक्ष्य का दण्ड हज़ार सम्बन्धियों का नरकवास है। हन्ति जातानजातांश्च हिरण्यार्थेऽनृतं वदन्। सर्वं भूम्यनृते हन्ति मा स्म भूम्यनृतं वदीः॥ २०९॥ इसी प्रकार स्वर्ण सम्बन्धी विवाद में मिथ्या-साक्ष्य का दण्ड झेलना पड़ता है। भूमि-सम्बन्धी विवाद में तो पूरे वंश का सर्वनाश हो जाता है। अतः भूमि के विषय में तो कभी मिथ्या साक्ष्य का सोचना तक नहीं चाहिए। एकमेवाद्वितीयं तत् प्राहुः पावनमात्मनः। सत्यं स्वर्गस्य सोपानं पारावारस्य नौरिव॥ २१०॥ जिस प्रकार नदी को पार करने का एकमात्र सुनिश्चित साधन नौका है, उसी प्रकार आत्मा को पवित्र करने वाला साधन सत्य है, सत्य ही स्वर्ग का सोपान है। अतः व्यक्ति को राग-द्वेष तथा लोभ मोह आदि किसी भी कारणवश सत्य का नारदस्मृति / 117