नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 122, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंपितरस्त्ववलम्बन्ते त्वयि साक्षित्वमागते। तारयिष्यति किं तस्मात् किं चायं पातयिष्यति ॥ २२२ ॥ साक्ष्य के लिए उपस्थित आप लोगों की ओर आपके पितर बड़ी उत्सुकता से देख रहे हैं कि हमारी सन्तति हमारे नाम को उज्ज्वल करती है कि हमें अपमानित करती है। आपके सत्य बोलने से आपके पितर प्रसन्न होंगे और उन्हें सुख मिलेगा। इसके विपरीत आपके मिथ्या-भाषण से वे भी आत्मग्लानि तथा लज्जा से अपना सिर झुकाने को विवश होंगे। आपके पितर निकृष्ट आचरण वाली पीढ़ी को देखकर दुखी और खिन्न होंगे। अब यह आपके अपने हाथ में है कि आप अपने पितरों को तृप्त करते हैं कि सन्तप्त करते हैं। सत्यमात्मा मनुष्यस्य सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितम्। सत्यमुक्त्वात्मनात्मानं श्रेयसा सन्नियोजय ॥ २२३ ॥ अपनी आत्मा की ध्वनि को सुनिये। आत्मा सत्स्वरूप परमात्मा का अंश होने से सत्य है। सत्य के बल पर ही धरती स्थिर है। सत्य-भाषण के द्वारा आप अपनी आत्मा को श्रेय के साथ जोड़कर अपना ही हित करेंगे। आप लोग मिथ्या-भाषण करके अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मारने की भूल कदापि न कीजिये। यस्यां रात्रावजनिष्ठा यस्यां रात्रौ मरिष्यसि। वृथा तदन्तरं तुभ्यं साक्ष्यं चेदन्यथा कृथाः ॥ २२४ ॥ आपके द्वारा मिथ्या-भाषण का अर्थ—अमूल्य मानव-जीवन को सर्वथा नष्ट करना होगा। जन्म से मृत्यु की मध्यावधि में किये गये आपके सभी शुभकर्म आपके मिथ्या-साक्ष्य देते ही तत्क्षण भस्म हो जायेंगे और आप घोर पापी बन जायेंगे। ब्रह्मघ्नस्य तु ये लोका ये च स्त्री बालघातिनाम्। ये च लोकाः कृतघ्नस्य ते ते स्युर्ब्रुवतो यथा ॥ २२५ ॥ इस तथ्य का कभी विस्मरण नहीं करना चाहिए कि मिथ्या साक्ष्य देने वालों को ब्रह्महत्या करने वाले, अबला का वध करने वाले, अबोध बालक की हत्या करने वाले और कृतघ्न व्यक्तियों को मिलने वाले घने अन्धकार से घिरे अत्यन्त दुर्गन्धित नरकों की प्राप्ति होती है। नास्ति सत्यात् परो धर्मो नानृतात् पातकं परम्। साक्षिधर्मे विशेषेण सत्यमेव वदेदतः ॥ २२६ ॥ सत्य से बड़ा कोई दूसरा धर्म और असत्य से बड़ा कोई दूसरा पाप इस धरती पर है ही नहीं। साक्षियों के लिए तो सत्य भाषण का विशेष महत्त्व है, अतः मेरा आपसे सत्य बोलने का पुनः पुनः अनुरोध है। टिप्पणी—इस सम्बन्ध में पुराण में कहा गया है— 120 / नारदस्मृति