नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 125, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तमर्ण के विवाद की सत्यता को सिद्ध करने की निम्नोक्त तीन विधियां हैं। चोदना प्रतिकालं च युक्तिलेशस्तथैव च। तृतीयः शपथः प्रोक्तस्तैरेवं साधयेत् क्रमात्॥236॥ प्रथम विधि है—ऋण के लेन देन का ठीक ठीक समय—यदि उस समय अधमर्ण ने ऋण नहीं लिया, तो वह कहां था और क्या कर रहा था—के विषय में गहरी पूछताछ करनी चाहिए। द्वितीय विधि है—ऋण की याचना करते समय अधमर्ण द्वारा प्रस्तुत कारण अथवा उद्देश्य—यदि ऋण नहीं लिया गया, तो निर्दिष्ट उद्देश्य की पूर्ति कैसे और कहां से हो गयी—के सम्बन्ध में टटोलना चाहिए। तृतीय विधि है—धर्म, ईश्वर, न्यायवृत्ति तथा पुत्र पौत्रादि की शपथ देकर उसे सत्य बोलने के लिए प्रेरित करना चाहिए। अभीक्ष्णं चोद्यमानो यः प्रतिहन्यान्न तद्वचः। त्रिचतुः पञ्चकृत्वो वा परतोऽर्थं सदापयेत्॥237॥ बार-बार पूछे जाने और अधमर्ण द्वारा एक ही उत्तर देने पर उससे पांच छह ही नहीं, दस बार भी पूछा जाना चाहिए; क्योंकि बार-बार पूछे जाने पर कभी- कभी सत्य मुंह से निकल ही पड़ता है, अपराधी द्वारा सत्य को निरन्तर छिपाना कठिन हो जाता है। यहां यह उल्लेखनीय है कि प्रतिवादी अनेक बार वही एक प्रश्न पूछे जाने के सम्बन्ध में किसी प्रकार की आपत्ति नहीं कर सकता। उससे जितनी बार पूछा जाये, उतनी बार उसे उत्तर देना ही होता है और यदि उसके किसी उत्तर में कहीं बदलाव आता है, तो इस आधार पर उसे आड़े हाथों लिया जा सकता है। चोदना प्रतिघाते तु युक्तिलेशैस्तमन्वियात्। देशकालार्थसम्बन्धपरिमाणक्रियादिभिः ॥238॥ सामान्य पूछताछ की अवहेलना करने वाले प्रतिवादी से देश, काल, अर्थ, सम्बन्ध, परिमाण और लेन-देन की क्रिया आदि से सम्बन्धित प्रश्नों को घुमा- फिरा कर पूछना चाहिए। युक्तिष्वप्यसमर्थासु शपथैरैनं मर्दयेत्। देशकालबलापेक्षमग्न्यम्बुसुकृतादिभिः ॥239॥ युक्ति से कार्य न बनने पर तथा देश, काल और सम्बन्ध आदि की पूछताछ का भी कुछ परिणाम न निकलने पर, उसे अग्नि, जल और उसके पुण्यों की शपथ देकर सत्य बोलने के लिए प्रेरित-प्रोत्साहित करना चाहिए। सत्य को नकारने वाले को धर्म और ईश्वर का भय दिखाकर तथा असत्य और बेईमानी के दुष्परिणाम का अतिरञ्जित वर्णन करके, उसे सत्य को उगलने के लिए बाध्य करना चाहिए। नारदस्मृति / 123