नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 127, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तर्षयस्तथेन्द्रेण पुष्करार्थेन शङ्किताः । शेपुः शपथमव्यग्राः परस्परविशुद्धये ॥ २४४ ॥ इसी प्रकार पुष्कर के विषय में इन्द्र द्वारा डराये गये सप्तर्षियों ने भी दैवी प्रयोग का आश्रय लिया था। सप्तर्षियों ने इन्द्र को दुर्गति का पात्र बनने, नरक भोगने, पतित होने जैसे शाप के रूप में चेताया था और इन्द्र ने इसे गम्भीरता से लेते हुए अपनी भूल को स्वीकार किया था और पश्चात्ताप करते हुए भविष्य में कभी ऐसा औद्धत्य न करने का आश्वासन देते हुए क्षमायाचना का निवेदन किया था। अयुक्तं साहसं कृत्वा प्रत्यापत्तिं भजेत् यः । ब्रूयात् स्वयं वा सदिति तस्यार्धविनयः स्मृतः ॥ २४५ ॥ अकरणीय एवं अवाञ्छनीय दुष्कर्म अथवा साहसिक कर्म करके स्वयं ही अपनी भूल को स्वीकार करने वाले, पश्चात्ताप करने वाले तथा दण्ड के लिए आत्मसमर्पण करने वाले को उसके अपराध के लिए निर्धारित दण्ड का आधा दण्ड देना चाहिए। वस्तुतः दण्ड का उद्देश्य व्यक्ति को सुधारना और सत्पथ पर लाना है। सुधारकों और मनोवैज्ञानिकों ने दण्ड के भय से सुधार की सम्भावना में अपनी आस्था प्रकट नहीं की। उनके अनुसार भय किसी भी बुराई को मिटाने का प्रभावी एवं स्थायी समाधान नहीं। इसकी अपेक्षा शिक्षा एवं उपदेश अधिक उपयोगी हैं। इस सन्दर्भ में अपना अपराध स्वीकार करने वाला तो क्षमा का पात्र है; क्योंकि उसने दण्ड से पूर्व ही दण्ड के उद्देश्य को पूरा कर दिया तथा न्याय-प्रक्रिया को जांच-परख के झंझट से बचा दिया। निष्कर्षतः दण्ड में न्यूनता लाने का स्मृतिकार का मत व्यावहारिक एवं युक्तिसंगत है। गृह्यमानस्तु वैचित्र्याद्यदि पापः स जीयते। सभ्यास्तस्य न तुष्यन्ति तीव्रो दण्डश्च पात्यते ॥ २४६ ॥ विचित्र ढंग से अनोखी चर्चा करके न्याय-प्रक्रिया को भटकाने की चेष्टा करने वाले अपराधी मनोवृत्ति के वादी अथवा प्रतिवादी अथवा साक्षी के असन्तुष्ट एवं खिन्न सभ्यों (न्यायाधिकारियों) को उसे उसके अपराध के लिए निर्धारित दण्ड से दुगुना दण्ड देकर भली प्रकार अनुशासित करना चाहिए। यदा साक्षी न विद्येत विवादे वदतां नृणाम्। तदा दिव्यैः परीक्ष्येत शपथैश्च पृथग्विधैः ॥ २४७ ॥ विवाद करने वाले वादी-प्रतिवादी के साक्षीविहीन होने पर शपथों तथा दिव्य उपायों-धर्म और ईश्वर को साक्षी मानकर सत्य बोलने का अनुरोध, असत्य बोलने पर दैवी प्रकोप का भय दिखाना तथा वंश-नाश की आशंका आदि द्वारा यथार्थ को जानने और तदनुरूप निर्णय पर पहुंचने का प्रयास करना चाहिए। नारदस्मृति / 125