नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 13, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम अध्याय इस संसार के सभी प्राणियों का व्यवहार के क्षेत्र में पथ-प्रदर्शन करने के रूप में कल्याण करने के लिए तथा आचार-परम्परा की सुरक्षा के लिए¹ भगवान्² मनु ने सर्वप्रथम 'मनुस्मृति' के रूप में लोकप्रसिद्ध धर्मशास्त्र की रचना की। इस प्रकार स्मृतिकार नारद मनु को प्रथम स्मृतिकार मानते हैं और स्मृति रचना के दो उद्देश्य स्वीकार करते हैं - प्रथम, लोगों का पथ-प्रदर्शन करना, अर्थात् करणीय-अकरणीय का बोध कराकर उन्हें सत् के ग्रहण और असत् के परित्याग का दिशा-निर्देश करने के रूप में उनका कल्याण करना तथा द्वितीय, आचार परम्परा को संरक्षण प्रदान करना, अर्थात् ऋषियों की धरोहर को लुप्त होने से बचाने के रूप में उसे भावी पीढ़ी को सौंपना। मनुस्मृति की अनुक्रमणिका का परिचय देते हुए नारदजी कहते हैं- उस ग्रन्थ में एक लाख श्लोकों और एक हज़ार आठ अध्यायों में निबद्ध निम्नोक्त चौबीस प्रकरण हैं - (1) विश्व की उत्पत्ति, (2) प्राणियों का विभाजन, (3) उत्तम देश (आर्यावर्त्त) का प्रमाण-विस्तार, सीमाएं आदि, (4) राज्य परिषद् का लक्षण- गठन, स्वरूप तथा महत्त्व आदि, (5) वेदों तथा वेदांगों - शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष के अनुसार विभिन्न यज्ञों - अश्वमेध आदि-तथा यागों के अनुष्ठान का विधान, (6) आचार, अर्थात् सदाचार, (7) लोक-व्यवहार, (8) कण्टकशोधन (शत्रुनाश), (9) राजा के लिए धर्म-रूप में आचरणीय नियमों का विधान, (10-11) वर्ण तथा आश्रम का विभाग, (12) विवाह, (13) न्याय, (14) स्त्रियों तथा पुरुषों के वैकल्पिक-असामान्य स्थिति में किये
- धर्म की रक्षा किये जाने पर वह रक्षक और हिंसा किये जाने पर वह हिंसक बन जाता है- "धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।"
- भगवान् शब्द का अर्थ है भग- ऐश्वर्य + वान् (ऐश्वर्य वाला)। ऐश्वर्य के अन्तर्गत विष्णु पुराण में छह विशेषताएं परिगणित हैं। एक अन्य ग्रन्थ में भी छह अन्य विशेषताओं का उल्लेख हुआ है। उत्पत्ति और प्रलय, सभी प्राणियों की गति और अगति तथा विद्या और अविद्या। इन्हीं विभिन्न विशेषताओं का अर्थ देने वाले भगवान् शब्द का प्रयोग परमपिता परमात्मा के लिए किया जाता है। वीर्य (सात्त्विक बल) यश (शुभकर्मों से अर्जित), श्री (रूप-सौन्दर्य), ज्ञान, वैराग्य (अनासक्ति) तथा समग्रता (पूर्णता)। नारदस्मृति / 11