भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

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दीप, नैवेद्य आदि से अर्चन-पूजन करने के लिए कहना चाहिए। इस पूजन से निवृत्त हुए भक्त को तीन बार उसके आराध्य देव के चरणोदक का आचमन कराना चाहिए। सप्ताहाभ्यन्तरे यस्य द्विसप्ताहेन वाशुभम्। प्रत्यात्मिकं तु दृश्येत सैव तस्य विभावना ॥ 330 ॥ कोश दिव्य के प्रति समर्पित अभियुक्त व्यक्ति की स्वयं की अथवा उसके किसी आत्मीय व्यक्ति की एक सप्ताह अथवा दो सप्ताहों के भीतर हानि होने अथवा क्षति पहुंचने पर उसे झूठा और दोषी समझना चाहिए, अन्यथा उसे सर्वथा शुद्ध, निर्दोष और सच्चा प्रमाणित मानना चाहिए। ऊर्ध्वं यस्य द्विसप्ताहान्महदप्यशुभं भवेत्। नाभियोज्यः स केनापि कृतकालव्यतिक्रमात् ॥ 331 ॥ दो सप्ताहों के उपरान्त अभियुक्त के साथ घटने वाली किसी अशुभ घटना का सम्बन्ध कोश दिव्य के साथ नहीं जोड़ना चाहिए; क्योंकि परीक्षा के लिए निर्धारित समय बीत चुका होता है और एक बार निर्दोष घोषित व्यक्ति को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता। अभियुक्त समय-सीमा के लिए प्रतिबद्ध होता है, न कि जीवन-भर के लिए उत्तरदायी होता है। महापराधे निर्धर्मे कृतघ्ने क्लीवकुत्सिते। नास्तिकव्रात्यदासेषु कोशपानं विवर्जयेत् ॥ 332 ॥ कोशपान सामान्य अपराधों के लिए है, किसी बहुत बड़े अपराध, यथा ब्रह्महत्या, गोवध व गुरुपत्नी-गमन आदि के हो जाने पर इस दिव्य का प्रयोग वर्जित है। किसी धर्मरहित स्थल—द्यूतशाला तथा वेश्यागृह आदि—में हुए पाप में भी इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, कृतघ्न, क्लीव, कुत्सित, नास्तिक, व्रात्य (आचार-भ्रष्ट तथा अतिच्युत) और दासों के लिए भी यह प्रयोग निषिद्ध है। केवल धर्मनिष्ठ एवं आचार-परायण द्विजों के लिए ही यह प्रयोग है। संक्षेपतः धर्मभीरु पुरुषों पर लगे साधारण अपराधों के आरोप की सत्यता- असत्यता के निर्णय के लिए कोशपान का विधान है। यथोक्तेन विधानेन पञ्चदिव्यानि धर्मवित्। दत्त्वा राजाभिशस्तानां प्रेत्य चेह च नन्दति ॥ 333 ॥ राजा उपर्युक्त विधि के अनुसार पांच दिव्यों—घट दिव्य, अग्नि दिव्य, जल दिव्य, विष दिव्य तथा कोश दिव्य—से अभियुक्तों को अपनी निर्दोषिता को सिद्ध करने का अवसर देने के रूप में न्याय की रक्षा करने के पुण्य के फलस्वरूप इस लोक में तथा परलोक में सुख भोगता है और यश अर्जित करता है। 142 / नारदस्मृति