नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअतः परिवारजनों की आवश्यकता से अतिरिक्त अवशिष्ट धन ही देय होता है। परिवार के लोगों की आवश्यकता की उपेक्षा करके दिया गया दान 'अपहरण' कहलाता है और इसके लिए दानकर्ता पुण्य के स्थान पर पाप का भागी बनता है। यस्य त्रैवार्षिकं वित्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्तये। अधिकं वापि विद्येत स सोमं पातुमर्हति ॥ 7 ॥ तीन वर्षों तक अथवा उससे भी अधिक समय तक परिवार के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त धन रखने वाले गृहस्थ को ही यज्ञ-यागादि करने का अधिकार है। अभिप्राय यह है कि सोमपान करने व यज्ञ-यागादि के लिए प्रस्तुत होने से पूर्व गृहस्थ के लिए यह विचारणीय होता है कि क्या उसके पास तीन वर्षों तक परिवारजनों की सभी प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त धन विद्यमान है। यदि ऐसा नहीं, तो व्यक्ति को किसी बड़े यज्ञ को सम्पन्न करने के विषय में सोचने तक का अधिकार नहीं। परिवारजनों की उपेक्षा करके पुण्य कर्म करना सर्वथा अनुचित है। टिप्पणी- लगता है कि सोमपान किये जाने वाले बृहत् यज्ञ-यागादि की तैयारी में तथा उसे सम्पन्न करने में दो-तीन वर्ष लग जाते होंगे। इस अवधि में व्यक्ति इस प्रकार व्यस्त हो जाता होगा कि उसके लिए व्यापार-धन्धा करना और धन कमाना सम्भव ही नहीं रहता होगा। इसीलिए तीन वर्षों तक परिवार के भरण- पोषण की पूर्व-व्यवस्था करने का निर्देश दिया गया है। पण्यमूल्यं भृतिस्तुष्ट्यानां स्नेहात् प्रत्युपकारतः । स्त्रीभक्त्यानुग्रहार्थं च दत्तं सप्तविधं स्मृतम् ॥ 8 ॥ दत्त धन के निम्नोक्त सात प्रकार-भेद हैं- 1. पण्यमूल्य - ख़रीदे सामान का दाम चुकाना, 2. भृति-वेतन अथवा भत्ता, 3. तोष - किसी के कार्य पर प्रसन्न होकर उसे पुरस्कृत करना, 4. स्नेहसूचन - मित्र, बन्धु, प्रियजन के प्रति स्नेह- प्रदर्शन के रूप में उपहार देना, 5. प्रत्युपकार - किसी के उपकार के भार को हलका करने के लिए उसे भेंट के रूप में समर्पित करना, 6. विवाह आदि में शगुन के रूप में कन्या, भगिनी आदि को स्त्रीशुल्क के रूप में सौंपना तथा 7. अनुग्रह - किसी अभावग्रस्त की सहायता करना। इस प्रकार आज की भाषा में दान के निम्नोक्त सात प्रकार हैं- विनिमय, वेतन, पुरस्कार, उपहार, प्रत्युपकार, शुल्क तथा सहायता। अदत्तं तु भयक्रोधद्वेषशोककरुगन्वितैः । तथोत्कोचपरीहासव्यत्यासच्छलयोगतः ॥ 9 ॥ बालमूढास्वतन्त्रार्तमत्तोन्मत्तापवर्जितम् । कर्त्ता ममायं कर्मेति प्रतिलाभेच्छया च यत् ॥ 10 ॥ नारदस्मृति / 157