भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 161, कुल 304 में से

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दिये धन को अदत्त ही मानना चाहिए। अपात्रे पात्रमित्युक्ते कार्ये वा धर्मसंहिते। यद्दत्तं स्यादविज्ञानाददत्तं तदपि स्मृतम्॥ 11 ॥ इसी तथ्य को इस पद्य में स्पष्ट करते हुए कहा गया है—1. अयोग्य व्यक्ति द्वारा अपने को योग्य बताकर लिया (ऐंठा) गया धन। उदाहरणार्थ, किसी अशिक्षित द्वारा अपने को विद्वान् धर्मात्मा बताकर धोखे से वसूल किया धन तथा 2. धर्मकार्य— यज्ञ-यागादि को सम्पन्न करने अथवा तीर्थाटन करने अथवा कन्या का विवाह करने—के लिए प्राप्त धन को द्यूत-क्रीड़ा व मदिरापान आदि में उड़ाना आदि। इस प्रकार असत्य एवं दुरुपयोग आदि की स्थिति में दत्त को अदत्त मानना चाहिए। अभिप्राय यह है कि यदि उपर्युक्त सभी स्थितियों में धन देने का वचन किया गया है, तो उसे नकार देना चाहिए और यदि धन दे दिया गया है, तो उसे वापस लेने का उद्यम करना चाहिए। गृह्णात्यदत्तं यो लोभाद् यश्चादेयं प्रयच्छति। अदेयदायको दण्डस्तथादत्तप्रतीच्छकः॥ 12 ॥ न देने योग्य स्थिति में भी न देने योग्य वस्तु को लोभवश ग्रहण करने वाला 'अदत्त प्रतीच्छक' कहलाता है तथा अदेय स्थिति में अदेय वस्तु को देने वाला 'अदेय दायक' कहलाता है। प्रशासन को इन दोनों को यथोचित दण्ड देना चाहिए। ॥ चतुर्थ अध्याय का चतुर्थ प्रकरण समाप्त॥ नारदस्मृति / 159

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