भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 304 में से

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पृष्ठ 164

**टिप्पणी—**इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि प्राचीनकाल में स्वामी अपने दास-दासी का यौन-शोषण भी करते थे। दासों को स्वामी की इच्छा का विरोध करने का अधिकार नहीं था। स्वामी उनकी चमड़ी उधेड़ सकता था। यहां तक कि उनके अधमरा हो जाने पर उसका उपचार कराने-न कराने के लिए स्वामी स्वतन्त्र था। दास की मृत्यु के लिए स्वामी उत्तरदायी नहीं था। क्या मानवता थी ? आविद्याग्रहणाच्छिष्यः शुश्रूषेत प्रयतो गुरुम्। तद्वृत्तिर्गुरुदारेषु गुरुपुत्रे तथैव च॥ 8॥ शिष्य को विद्या-ग्रहणपर्यन्त पूरे समय पूर्ण मनोयोग से गुरु की सेवा में अपने को समर्पित करना चाहिए। यही सेवा का भाव गुरुपत्नी और गुरुपुत्र के प्रति भी रखना चाहिए। ब्रह्मचारी चरेद्भैक्षमधः शाय्यनलङ्कृतः। जघन्यशायी सर्वेषां पूर्वोत्थायी गुरोर्गृहे॥ 9॥ गुरुकुल में रहने वाले शिष्य (अन्तेवासी) को अपने निवासकाल में निम्नोक्त नियमों का दृढ़ता से पालन करना चाहिए—1. ब्रह्मचर्य का पालन, अर्थात् स्त्री संग की इच्छा भी न करना और न ही इस विषय में सोचना, 2. भिक्षा से उदर- भरण करना, अर्थात् रुचिकर, स्वादिष्ट तथा मनचाहे भोजन के स्थान पर यथाप्राप्त से सन्तोष करना तथा याचक के रूप में विनम्रता तथा साधुवृत्ति—जो दे उसका भी भला, जो न दे उसका भी भला—को अपनाना और दूसरों से मांगे अन्न पर जीते हुए समाज को लौटाने की भावना का पाठ पढ़ना, 3. भूतलशैया—रीढ़ की हड्डी को सुदृढ़ बनाना, 4. अलंकरण की इच्छा का त्याग तथा 5. गुरु-परिवार के सोने के उपरान्त सोना और जागने से पूर्व जागना। नासन्दिष्टः प्रतिष्ठेत तिष्ठेद्वा गुरुणा क्वचित्। सन्दिष्टः प्रतिकुर्वीत शक्तश्चेदविचारयन्॥ 10॥ गुरु का आदेश न मिलने तक शिष्य को उनके सामने उपस्थित रहना चाहिए। उनकी अनुमति प्राप्त किये बिना वहां से खिसक जाना कदापि उचित नहीं। गुरु के आदेश के औचित्य पर विचार किये बिना ही उसका पालन करना शिष्य का धर्म एवं कर्तव्य है। यथाकालमधीयीत यावन्न विमना गुरुः। आसीनोऽधो गुरोः पार्श्वे फलके वा समाहितः॥ 11॥ शिष्य को नियम एवं निश्चित समय पर अपना अध्ययन प्रारम्भ करना चाहिए और जब तक गुरु पठन पाठन को बन्द करने का आदेश नहीं देते, तब तक अध्ययन जारी रखना चाहिए। शिष्य को पाठ पढ़ते समय गुरु के सामने धरती पर आसन बिछाकर और संयत होकर बैठना चाहिए। 162 / नारदस्मृति