नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 169, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंबन्धक में आया दास, उसके मूलस्वामी द्वारा धन चुकाने पर मुक्त हो जाता है। हां, उसके मूलस्वामी द्वारा निश्चित अवधि में ऋण न चुका सकने पर वह 'क्रीतदास' बन जाता है। ऋणं तु सोदयं दत्वा ऋणी दास्यात् प्रमुच्यते। कृतकालव्यपगमात् कृतकोऽपि विमुच्यते ॥ 33 ॥ भारी ऋण से मुक्त किया गया और प्रत्युपकार के रूप में दास बना व्यक्ति, ब्याज समेत ऋण राशि को चुका देने पर दासत्व से मुक्त हो सकता है। इसी प्रकार निश्चित अवधि के लिए दासत्व के रूप में अनुबन्धित व्यक्ति अवधि बीतने पर अपने आप मुक्त समझा जाता है। तवाह्मित्युपगतो ध्वजप्राप्तः रणार्जितः। प्रतिशीर्षप्रदानेन मुच्यते तुल्यकर्मणा ॥ 34 ॥ स्वयं अपने को दासत्व के लिए सौंपने वाले तथा युद्ध में बन्दी बनाकर लाये गये दास, स्थिति बदलने पर, अर्थात् अपना पेट भरने को समर्थ होने पर तथा राजाओं में सन्धि समझौता हो जाने पर दासत्व से मुक्त हो जाते हैं। राज्ञामेव तु दासः स्यात् प्रव्रज्यावसितो नरः। न तस्य विप्रमोक्षोऽस्ति न विशुद्धिः कथञ्चन ॥ 35 ॥ भ्रष्ट संन्यासी—संन्यास आश्रम में रहते हुए अपने ऊपर संयम न रख पाने वाला—राजा का दास होता है। ऐसे नीच पुरुष के लिए न कोई प्रायश्चित्त है और न ही कोई मुक्ति है। भक्तस्योपेक्षणात् सद्यो भक्तदासः प्रमुच्यते। निग्रहाद्वडवानां तु मुच्यते वडवाहृतः ॥ 36 ॥ जीवन-भर भरण-पोषण की आशा से दास बना व्यक्ति उपयुक्त भरण-पोषण न मिलने पर दासकर्म को छोड़ सकता है। इसी प्रकार दासी द्वारा अपने साथ लाया होने से दास बना उसका बेटा भी मां की मुक्ति के साथ अपने आप मुक्त हो जाता है। विक्रीणीते य आत्मानं स्वतन्त्रः सन्नराधमः। स जघन्यतरस्तेषां नैव दास्यात् प्रमुच्यते ॥ 37 ॥ अपनी स्वतन्त्रता को स्वयं परतन्त्रता में बदलने वाला, अर्थात् अपने को बेचने वाला अधम एवं जघन्य पुरुष कभी दासत्व से मुक्त नहीं हो पाता। चौरापहृतविक्रीता ये च दासीकृता बलात्। राज्ञा मोक्षयितव्यास्ते दासत्वं तेषु नेष्यते ॥ 38 ॥ चोरों के द्वारा अपहरण करके दास के रूप में बेचे जाने वाले अथवा बलपूर्वक दास बनाये जाने वाले, राजा द्वारा मुक्त करा दिये जाते हैं, उन्हें अधिक समय तक नारदस्मृति / 167