भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 304 में से

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कर्माकुर्वन् प्रतिश्रुत्य कार्यो दत्वा भृतिं बलात्। भृतिं गृहीत्वाऽकुर्वाणो द्विगुणं भृतिमावहेत् ॥ ५॥ काम करने के लिए पारिश्रमिक निश्चित करके तथा पेशगी लेकर अथवा न लेकर काम न करने वाले को निश्चित राशि देकर उससे बलपूर्वक काम कराना चाहिए और उसे काम करना चाहिए। काम करने से आनाकानी करने वाले से निर्धारित पारिश्रमिक से दुगुनी राशि दण्ड के रूप में वसूल करनी चाहिए। भृतिषड्भागमादद्यात् पण्यं युग्यकृतं त्यजन्। अददत् कारयित्वा तु सोदयां भृतिमावहेत् ॥ ६ ॥ व्यापारिक सामान के परिवहन—गाड़ी, छकड़ा, नौका, रथ, गज तथा अश्व— का, अर्थात् एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाने का अनुबन्ध करके सामान न पहुंचाने वाले अथवा मार्ग में ही कहीं छोड़ देने वाले से निश्चित किराये का छठा भाग दण्ड के रूप में वसूल करना चाहिए। इसी प्रकार, यदि सामान का स्वामी निश्चित भाड़ा समय पर नहीं देता है, तो उसे ब्याज समेत भुगतान करना चाहिए। अनयन् भाटयित्वा तु भाण्डवान् यानवाहने। दाप्यो भृतिचतुर्भागं सममर्धपथे त्यजन्॥ 7 ॥ यान (ट्रक-टैम्पू आदि अथवा वाहन-बैल-गाड़ी, भैंसा-गाड़ी आदि) अथवा वाहन को किराये पर लेने की बात पक्की करके, न लेने वाले को निश्चित किये गये किराये का चौथा भाग क्षतिपूर्ति के रूप में वाहन के स्वामी को देना चाहिए। भाड़े पर लिये वाहन को बीच रास्ते में छोड़ देने पर सवार को पूरे भाड़े का भुगतान करना चाहिए। अनयन्वाहकोऽप्येवं भृतिहानिमवाप्नुयात्। द्विगुणां तु भृतिं दाप्यः प्रस्थाने विघ्नमाचरन्॥ 8 ॥ वाहन लेने के लिए वचनबद्ध होकर, वाहन न लेने वाले द्वारा वाहन के स्वामी को दूसरे व्यक्ति को न बिठाने से हुई क्षति की पूर्ति करनी चाहिए। इसी प्रकार वाहन देने को वचनबद्ध होकर मुकरने अथवा प्रस्थान में विघ्न डालने वाले वाहनचालक को निश्चित किये गये भाड़े से दुगुनी रकम दण्ड के रूप में देनी चाहिए। भाण्डं व्यसनमागच्छेद्यदि वाहकदोषतः। स दाप्यो यत्प्रणष्टं स्याद्दैवराजकृतादृते॥ 9 ॥ दैवी आपत्ति—भूकम्प, दुर्घटना तथा तस्करों का उत्पात आदि तथा राजकीय संकट—वाहन द्वारा मार्ग-शुल्क (रोड-टैक्स) आदि चुकता न होने से वाहन को जाने की अनुमति न देना आदि—को छोड़कर चालक के दोष से सवार को होने वाली हानि—सामान चुराया जाना, चालक की दुरभिसन्धि से उसके द्वारा सिखाये 170 / नारदस्मृति

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