भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

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पृष्ठ 179
  1. विक्रीय-असम्प्रदान विक्रीय पण्यं मूल्येन क्रेत्रे यन्न प्रदीयते। विक्रीयासम्प्रदानं तद्विवादपदमुच्यते ॥ 1 ॥ सामान बेचकर और उसका दाम वसूल करने के उपरान्त बेचा हुआ सामान क्रेता को न सौंपना 'विक्रीय-असम्प्रदान' झगड़े का मामला कहलाता है। लोकेऽस्मिन् द्विविधं द्रव्यं जङ्गमं स्थावरं तथा। क्रयविक्रयधर्मेषु सर्वं तत् पण्यमुच्यते ॥ 2 ॥ लोक में क्रय-विक्रय किये जाने वाले पदार्थों के दो रूप हैं—1. चल सम्पत्ति-गज, रथ, अश्व, नक़दी, स्वर्ण-रजत तथा दास आदि।
  2. अचल सम्पत्ति- धरती, मकान, दुकान, खेत तथा गोदाम आदि। इन दोनों सम्पत्तियों के क्रय-विक्रय योग्य होने से इन्हें 'पण्य' नाम दिया जाता है। षड्विधस्तस्य तु बुधैर्दानादानविधिः स्मृतः। गणितं तुलिमं मेयं क्रियया रूपतः श्रिया ॥ 3 ॥ विद्वानों ने पण्य के क्रय-विक्रय (लेन-देन) के छह आधार निर्धारित किये हैं- गणितं- गिनकर देना, दर्जन के भाव, कोड़ी के भाव। तुलिम-तौलकर बेचना, किलोग्राम, टन, क्विण्टल के भाव। मेय-मापकर बेचना, गज़, फुट, मीटर के भाव। क्रिया-कार्यक्षमता के आधार पर मूल्य निर्धारित कर बेचना, तीव्रगति और मन्दगति के अश्व का ऊंचा-नीचा दाम लगाना। रूप-वस्तु के सौन्दर्य के आधार पर दाम वसूल करना। कन्या के अथवा दासी के रूप-सौन्दर्य और आकर्षण के आधार पर उसका न्यूनाधिक मूल्य निर्धारित करना। श्री, अर्थात् दीप्ति-चमक-रत्नों, हीरे-मोतियों तथा मणियों की आभा के आधार पर एवं उनकी उत्कृष्टता-निकृष्टता के अनुरूप मूल्य निर्धारित करना। टिप्पणी-जड़ पदार्थों की श्री को ही चेतन प्राणियों का रूप-सौन्दर्य समझना चाहिए। दोनों में समान रूप से आकर्षण होता है। विक्रीय पण्यं मूल्येन क्रेत्रे यो न प्रयच्छति। स्थावरस्योदयं दाप्यो जङ्गमस्य क्रियाफलम् ॥ 4 ॥ नारदस्मृति / 177