भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 192, कुल 304 में से

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प्रकार के दोषों के निवारण के लिए, अर्थात् केवल अपेक्षित जल की आपूर्ति के लिए सेतु का निर्माण करना चाहिए। पूर्वप्रवृत्तमुत्सन्नमपृष्ट्वा स्वामिनं तु यः। सेतुं प्रवर्तयेत् कश्चिन्न स तत् फलभाग् भवेत् ॥ 20 ॥ क्षेत्र के स्वामी की अनुमति प्राप्त किये बिना, दूसरे क्षेत्र में स्थित पुराने, टूटे- फूटे अथवा उखड़े-पुखड़े, अर्थात् क्षतिग्रस्त होने से उपयोग में न आ पाने वाले सेतु बांध आदि की मरम्मत कराने वाला अथवा नये बांध अथवा पुलिया आदि का निर्माण कराने वाला व्यक्ति क्षेत्र स्वामी से न तो ख़र्च वसूल कर सकता है और न ही उस पुलिया से अपने खेत की सिंचाई का लाभ उठा सकता है। मृते तु स्वामिनि पुनस्तद्वंश्ये वाऽपिमानवे। राजानमामन्त्र्य ततः प्रकुर्यात् सेतुकर्म तत् ॥ 21 ॥ क्षेत्र के स्वामी अथवा उसके उत्तराधिकारियों की खोज करने पर भी उनके न मिलने पर और उस क्षेत्र में पहले से विद्यमान ध्वस्त पुलिया-बांध की मरम्मत अथवा नये बांध का निर्माण आवश्यक होने पर प्रशासन द्वारा इस कार्य के निर्वहण के लिए निर्माण कार्य कराना सर्वोत्तम है, अन्यथा लिखित अनुमति के उपरान्त ही इस दिशा में प्रवृत्त होना चाहिए। अतोऽन्यथा क्लेशभाक्स्यान्मृगव्याधानुदर्शनात् । इषवस्तस्य नश्यन्ति यो विद्धमनुविध्यति ॥ 22 ॥ प्रशासन से सेतु-निर्माण का अनुरोध अथवा अनुमति प्राप्त किये बिना निर्माण- कार्य करने वाला व्यक्ति एक प्रकार से संकट को निमन्त्रण देता है, क्योंकि दूसरे क्षेत्र में किसी प्रकार का प्रवेश अथवा हस्तक्षेप अनधिकार चेष्टा होती है। जिस प्रकार व्याध द्वारा पहले से ही अपने बाणों से विद्ध मृग को अपने बाणों से बाँधने वाला अपने समय, बल और बाणों को व्यर्थ गंवाता है, मृग पर व्याध का ही अधिकार होता है, उसी प्रकार दूसरे के क्षेत्र में सेतु आदि निर्माण कराने वाला भी अपने समय, साधन और ऊर्जा को व्यर्थ करता है। उसके द्वारा किये गये निर्माण के लिए उसके विरुद्ध क़ानूनी कार्यवाही की जा सकती है। अशक्तप्रेतनष्टेषु क्षेत्रिकेष्वनिवारितः । क्षेत्रं चेद्विकृषेत् कश्चिदश्नुवीत स तत् फलम् ॥ 23 ॥ किसी क्षेत्र के मूल स्वामी के अशक्त, दिवंगत, अपराध के दण्ड-भय से लुप्त (लापता) हो जाने पर तथा स्वयं मूल स्वामी, उसके परिवार के किसी सदस्य अथवा उत्तराधिकारी द्वारा दखल, रोक टोक न किये जाने पर दूसरे के क्षेत्र में उपज बोने उगाने वाले को फल पाने का अधिकार मिल जाता है। परती भूमि का उपयोग कोई दोष नहीं। 190 / नारदस्मृति