नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ
पृष्ठ 199, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 199
को सन्तुष्ट कर पाने वाला—सिद्ध एवं निश्चित होने वाले बालक को ही कन्या को ग्रहण करने का अधिकारी समझना चाहिए। सुबद्धजत्रुजान्वस्थिः सुबद्धांसशिरोरुहः । स्थूलघाटास्तनूक्त्वग्विलग्नगतिस्वरः ॥ ९॥ रेतोऽस्योत्प्लवते नाप्सु ह्लादि मूत्रं च फेनिलम् । पुमान् स्याल्लक्षणैरेतैर्विपरीतैस्तु षण्ढकः ॥ १० ॥ निम्नोक्त लक्षणों वाले बालक को पुरुष और इन लक्षणों से रहित को नपुंसक समझना चाहिए—
- जंघाओं और घुटनों की हड्डी का सुदृढ़ और सुसम्बद्ध होना।
- कन्धों की भीतरी अस्थियों का बलशाली होना।
- मस्तक के ऊपर घने, काले और लम्बे केशों का होना।
- ग्रीवा के पिछले भाग का स्थूल होना।
- शरीर की त्वचा पर घने बालों का उगना।
- व्यक्ति की चाल में स्फूर्ति और तीव्रता का होना।
- स्वर का गम्भीर और मधुर होना।
- वीर्य का पानी के ऊपर स्थिर रहना, डूब बह न जाना तथा
- मूत्र का स्वाभाविक रूप से निकलना तथा उसका झाग लिये रहना। चतुर्दशविधः शास्त्रे षण्ढो दृष्टो मनीषिभिः । चिकित्स्यश्चाचिकित्स्यश्च तेषामुक्त्तो विधिः क्रमात् ॥ ११॥ शरीर-वैज्ञानिकों ने चौदह प्रकार के नपुंसक माने हैं। उनमें कुछ चिकित्सा द्वारा आरोग्य प्राप्त कर सकते हैं, अर्थात् नपुसंकत्व को पुंसत्व में बदला जा सकता है, परन्तु कुछ भेद ऐसे हैं, जिनमें चिकित्सा द्वारा भी कोई परिवर्तन नहीं आ पाता। कितना और कैसा भी उपचार क्यों न कर लिया जाये, नपुंसकता दूर नहीं हो पाती। नपुंसकता के निम्नोक्त चौदह भेद हैं। निसर्गषण्ढो वध्रश्च पक्षषण्ढस्तथैव च । अभिशापाद् गुरो रोगाद्देवक्रोधात्तथैव च ॥ १२ ॥ ईर्ष्याषण्ढश्च सेव्यश्च वातरेता मुखेभगः । आक्षिप्तो मोघबीजश्च शालीनोऽन्यापतिस्तथा ॥ १३ ॥
- जन्मजात—लिंग और अण्डकोश रहित।
- वध्र—दाढ़ी-मूंछ-रहित।
- पक्षषण्ढ—एक पक्ष---शुक्ल अथवा कृष्ण—में रति भोग करने में समर्थ और दूसरे पक्ष में सर्वथा अशक्त ।
- अभिशप्त—गुरु अथवा महात्मा आदि के शाप से नष्ट पुंसत्व। नारदस्मृति / 197