नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 20, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार नारदजी ने व्यवहार के निम्नोक्त तत्त्वों का उल्लेख किया है—पाद, स्थान, साधन, हित, व्यापकता, कार्य, अंग, पद, शाखा, अभियोग, योनि (उत्पत्ति स्थान), द्वार तथा गति। धर्म, व्यवहार, चरित्र और राजशासन को चरण माना गया है; क्योंकि इन्हीं से यह चलता-आगे बढ़ता है। इसकी स्थिति के चार स्थान हैं—सज्जन का साक्ष्य, लिखित प्रमाण, कलह-संघर्ष तथा राज्ञाज्ञा। इसे निपटाने के चार साधन—समझाना- बुझाना, कुछ देना-दिलाना, फूट डालना तथा दण्ड देना—चारों वर्गों के लोगों के हितसाधक हैं। एक साथ चारों—मुक़दमा करने वाला, साक्षी, समाज तथा प्रशासन— को प्रभावित करने वाला होने से यह चतुर्व्यापी—चारों ओर व्यापक—है। सत्यनिर्णय देने के रूप में यह धर्म, अर्थ और यश की प्रतिष्ठा तथा लोकरञ्जन आदि चारों उद्देश्यों (कार्यों) का पूरक (चतुष्कारी) है। प्रत्येक विवाद की उत्पत्ति काम से अथवा क्रोध से मानी जाती है। राजा के सन्धि, विग्रह आदि आठ अंगों के समान अभियोग भी आठ अंगों वाला होता है। इसके ऋण, दान आदि अठारह भेद हैं व सैकड़ों शाखाएं हैं। यह न केवल शारीरिक कष्ट को उत्पन्न करता है, अपितु मानसिक क्लेश-उद्वेग को भी जन्म देता है। इस प्रकार ये दो रूपों में अभियुक्त— आक्रान्त करने वाला—है। वादी-प्रतिवादी दो द्वार कहे जाते हैं तथा सत्य और छल का प्रयोग होने से इसकी दो गतियां (चालें) मानी गयी हैं। इस प्रकार प्रत्येक मुक़द्दमे के तेरह अंग होते हैं, जिनका विवरण अगले पद्यों में प्रस्तुत किया गया है। धर्मश्च व्यवहारश्च चरित्रं राजशासनम्। चतुष्पाद् व्यवहारोऽयमुत्तरः पूर्वबाधकः ॥ 10 ॥ लेन-देन के चार रूप-भेद हैं-धर्म, व्यवहार, चरित्र और राजाज्ञा। धर्म से व्यवहार को, व्यवहार से चरित्र को और चरित्र से राजाज्ञा को वरीयता प्राप्त है। उदाहरणार्थ, धर्म किसी विषय-नियोग, कन्याहरण तथा द्यूत आदि-की अनुमति देता है, परन्तु फिर भी व्यक्ति उसके विरुद्ध न्यायालय में प्रार्थना करता है, तो व्यवहार चलेगा। धर्म के विरुद्ध की गयी याचना की भी सुनवाई होगी। इसी प्रकार जिसके विरुद्ध आरोप लगाया गया है, यदि उसका चरित्र निष्कलंक है और अभियोग लगाने वाले के पास प्रमाण का अभाव है, तो चरित्र को प्रबलता प्राप्त होगी, परन्तु राजाज्ञा अन्तिम प्रमाण है। उसके सामने अन्य सभी कुछ गौण है। तत्र सत्ये स्थितो धर्मो व्यवहारस्तु साक्षिषु। चरित्रं पुस्तकरणे राजाज्ञायां तु शासनम् ॥ 11 ॥ 18 / नारदस्मृति