भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 217, कुल 304 में से

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पृष्ठ 217

न तो उसे भाभी के शरीर को मसलना चाहिए और न ही दोनों को एक-दूसरे का चुम्बन करना चाहिए। दोनों को मैथुन को यान्त्रिक क्रिया के रूप में ही ग्रहण करना चाहिए। टिप्पणी—इस सम्बन्ध में बोधायन सूत्रकार का कथन सर्वथा उपयुक्त ही है- मुखचुम्बनगात्रमर्दनादिभिः पुनः पुनः सम्भोगाशा पुत्रजन्मान्तरमपि वर्धते, तत्परिहाराय मुखचुम्बनादि निषिध्यते। इति मन्मतिः। अर्थात् मुखचुम्बन तथा शरीर मर्दन से सम्भोग की इच्छा बढ़ती है, जिसे पुत्रोत्पत्ति के उपरान्त भी रोक पाना सम्भव नहीं होता, मेरे विचार में इसी कारण से कदाचित् इन क्रियाओं का निषेध किया गया है। टिप्पणी- हमें तो यह समझ नहीं आता कि सम्भोग क्रिया में पुरुष द्वारा स्त्री के अंगों—स्तन, जंघा तथा जघन आदि—को स्पर्श-आलिंगन तथा मुख- चुम्बन आदि से बचना कैसे सम्भव है ? दो स्वस्थ युवक-युवती का एक बार सम्भोग-सुख को भोगने पर उसे सहसा छोड़ पाना भी कैसे सम्भव है ? हमें तो लगता है कि दोनों पुत्रोत्पत्ति को अपने मिलने में बाधक मानकर सन्तान-प्राप्ति के प्रति प्रयत्नशील ही नहीं होंगे। यह तो एक निर्विवाद तथ्य है कि यौन-सुख का परित्याग असम्भव नहीं, तो कठिन अवश्य है। स्त्री में मातृत्व की इच्छा अवश्य होती है, परन्तु यौन-सुख-भोग की इच्छा उससे भी अधिक प्रबल होती है। जब स्त्री को यह ज्ञात है कि उसके गुरुजन उसके गर्भधारण करते ही उसके नियुक्त देवर से मिलने नहीं देंगे, तो वह गर्भधारण को बहुत समय तक टालती जायेगी। इसके अतिरिक्त उनके गुप्त रूप से मिलने की सम्भावना को भी नकारा नहीं जा सकता। इस प्रकार हम तो प्राचीनकाल में बहुप्रचलित नियोग प्रथा को सर्वथा निर्दोष नहीं मानते। पुत्र-प्राप्ति को ही महत्त्वपूर्ण मानने का अर्थ स्त्री के व्यक्तित्व को कुण्ठित करना तो नहीं होना चाहिए। उसे केवल पुत्र जनने की मशीन तो नहीं बना देना चाहिए। कुले तदवशेषे हि सन्तानार्थं न कामतः। स्त्रियं पुत्रवतीं वन्ध्यां नीरजस्कामनिच्छतीम् ॥ 83 ॥ परिवार में उपयुक्त पुरुष के अभाव में गुरुजनों को किसी अन्य उपयुक्त व्यक्ति— भले ही आयु में छोटा पुरुष, बड़ी आयु की स्त्री के लिए अथवा आयु में बड़ा, छोटी आयु की स्त्री के लिए-को विधवा को पुत्रवती बनाने के लिए नियुक्त करना चाहिए। जब तक स्त्री रजस्वला न हो, अपनी वंश-परम्परा को चलाने के लिए देवर आदि किसी पर-पुरुष से मिलन को सहमत न हो तथा शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ न हो, तब तक नियुक्त पुरुष को उसे मैथुन के लिए निमन्त्रित नहीं करना चाहिए। कामवासना की तृप्ति के लिए सम्भोग में प्रवृत्त होने वाले स्त्री पुरुष नरकगामी होते हैं। नारदस्मृति / 215

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