भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

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फिर सम्बन्ध कैसा ? इसी आधार पर स्त्रियों को निर्धारित वर्षों तक प्रतीक्षा के अनन्तर दूसरे पुरुष से सम्बन्ध जोड़ने में कोई दोष नहीं है। आनुलोम्येन वर्णानां यज्जन्म स विधिः स्मृतः । प्रातिलोम्येन यज्जन्म स ज्ञेयो वर्णसंकरः ॥ 102 ॥ अनुलोम से उत्पन्न सन्तान, अर्थात् उच्च वर्ण के पुरुष द्वारा समान अथवा निम्न वर्ण की स्त्री से उत्पादित, उदाहरणार्थ, ब्राह्मण के वीर्य से ब्राह्मणी, परन्तु प्रतिलोम - निम्न वर्ण के पुरुष के वीर्य को धारण करने वाली उच्च वर्ण की स्त्री के उदर से उत्पन्न - सन्तान वर्णसंकर (पतित) कहलाती है। उदाहरणार्थ, क्षत्रिय पुरुष के वीर्य और ब्राह्मणी के उदर से उत्पन्न सन्तान अवैध कहलायेगी। अभिप्राय यह है कि भिन्न वर्ण जाति के स्त्री-पुरुषों की सन्तान के सम्बन्ध में महत्त्व वीर्य का है, क्षेत्र का नहीं। अनन्तरः स्मृतः पुत्रः एवं एकान्तरस्तथा । द्वयन्तरश्चानुलोम्येन तथैव प्रतिलोमतः ॥ 103 ॥ अनुलोम क्रम से ब्राह्मण के वीर्य से चारों वर्णों की स्त्रियों के उदर से उत्पन्न चारों पुत्र सवर्ण कहलाते हैं। इसी प्रकार क्षत्रिय के तीन, वैश्य के दो और शूद्र का एक ही पुत्र सवर्ण होता है, इसी प्रकार प्रतिलोम क्रम से शूद्र के तीन पुत्र, वैश्य के दो पुत्र व क्षत्रिय का एक पुत्र असवर्ण होता है। अतः पारशवश्चैव निषादश्चानुलोमतः । अम्बष्ठो मागधश्चैव क्षत्ता च क्षत्रियात्मजः ॥ 104 ॥ अनुलोम क्रम से उच्च वर्ण (ब्राह्मण) द्वारा निम्न वर्ण की स्त्रियों - क्षत्रिया, वैश्या तथा शूद्रा-से उत्पन्न किये गये पुत्र क्रमशः उग्र, पाराशव तथा निषाद कहलाते हैं, अर्थात् ब्राह्मण द्वारा क्षत्रिया से उत्पन्न पुत्र 'उग्र' कहलाता है। ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय द्वारा वैश्या स्त्री से उत्पादित पुत्र 'पाराशव' कहलाता है तथा ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय अथवा वैश्य द्वारा शूद्रा स्त्री से जना पुत्र 'निषाद' कहलाता है। इसी प्रकार प्रतिलोम क्रम से 'अम्बष्ठ,' 'मागध' और 'छत्ता' (क्षत्रियवर्ण) कहलाते हैं, अर्थात् शूद्र के वीर्य और वैश्या अथवा क्षत्रिया अथवा ब्राह्मणी स्त्री के उदर से उत्पन्न बालक 'अम्बष्ठ' कहलाता है, वैश्य के वीर्य और क्षत्रिया अथवा ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पन्न बालक 'मागध' कहलाता है तथा क्षत्रिय द्वारा ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पादित बालक 'छत्ता' कहलाता है। आनुलोम्येन तत्रैका द्वौ ज्ञेयौ प्रतिलोमतः । क्षत्राद्याः प्रतिलोमाः स्युरनुलोमास्त्विमे स्मृताः ॥ 105 ॥ प्राचीन दो व्यवस्थाओं - 1 उच्च वर्ण की स्त्री, उच्च अथवा समान वर्ग के अतिरिक्त किसी अन्य निम्न वर्ण की भोग्या बन ही नहीं सकती तथा 2. अपने से 220 / नारदस्मृति