भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

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पृष्ठ 224

प्रतिलोम्येन वर्णानां क्षत्तृवैदेहकावपि। अनन्तरः स्मृतः सूतो ब्राह्मण्यां क्षत्रियात् सुतः ॥ 110 ॥ इसी सन्दर्भ में प्रतिलोम सम्बन्ध—निम्न वर्ण के पुरुष द्वारा उच्च वर्ण की स्त्री के उदर से उत्पन्न—बालक 'क्षत्ता' और 'वैदेह' कहलाते हैं। क्षत्रिय द्वारा ब्राह्मणी के उदर से प्राप्त बालक 'अनन्तर' कहलाता है। मागधायोगवौ तद्वद् द्वौ पुत्रौ वैश्यशूद्रयोः । ब्राह्मण्यान्तरं वैश्यात् सूते वैदेहकं सुतम् ॥ 111 ॥ वैश्य द्वारा क्षत्रिया से उत्पन्न बालक 'मागध' और शूद्र द्वारा वैश्या से उत्पन्न बालक 'आयोगव' कहलाता है। वैश्य द्वारा ब्राह्मणी से उत्पन्न बालक 'एकान्तर' होता है, उसका दूसरा नाम 'वैदेहक' भी है। क्षत्तारं क्षत्रिया शूद्रात् पुत्रमेकान्तरं तथा। द्वयन्तरः प्रातिलोम्येन पापिष्ठः संकरे सति ॥ 112 ॥ शूद्र के वीर्य को धारण करने वाली क्षत्रिया 'क्षत्ता' नामक एकान्तर पुत्र को जनती है। प्रतिलोम्य में संकर होने पर, अर्थात् उस क्षत्ता द्वारा उच्च वर्ण की स्त्री को गर्भवती बनाने पर उत्पन्न बालक 'पापिष्ठ' कहलाता है। चाण्डालो जायते शूद्राद् ब्राह्मणी यत्र मुह्यति। तस्माद्राज्ञा विशेषेण स्त्रियो रक्ष्यास्तु संकरात् ॥ 113 ॥ अपनी मर्यादा की रक्षा न करने वाली, अर्थात् शूद्र से सम्भोग कराने वाली ब्राह्मणी 'चाण्डाल' को जन्म देती है। इस प्रकार उच्च वर्ण के पुरुषों और निम्न वर्ण की स्त्रियों अथवा निम्न वर्ण के पुरुषों और उच्च वर्ण की स्त्रियों के समागम से वर्णसंकर सन्तान उत्पन्न होती है, जो सामाजिक विकास के मार्ग में बाधक सिद्ध होती है। अतः राजा को इस प्रकार के सम्बन्धों को निरुत्साहित करने का वातावरण तैयार करना चाहिए। ॥ चतुर्थ अध्याय का द्वादश प्रकरण समाप्त ॥ 222 / नारदस्मृति