भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 232, कुल 304 में से

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पाने का अधिकार है। उनके यदि अन्य पुत्र भी हों, तो ऐसे पुत्र को अपना भाग ही पाने का अधिकार होता है। संसृष्टानां तु यो भागस्तेषामेव स इष्यते। अनपत्योऽशभाग्योऽपि निर्बीजेष्वितरानियात् ॥ २४ ॥ विभक्त होने के उपरान्त पुनः संयुक्त हुए भाइयों में से किसी एक भाई के पुत्रहीन होने पर, उसके भाग पर उसकी पत्नी का अधिकार होता है। पत्नी के भी मरने पर, लड़की-दामाद का उस सम्पत्ति पर अधिकार होता है, परन्तु मृत भाई के निस्सन्तान और पत्नी के भी मर जाने पर, उसके भाग की सम्पत्ति पर सभी भाइयों का समान अधिकार होता है। भ्रातृणामप्रजाः प्रेयात्कश्चिच्चेत् प्रव्रजेत् वा। विभजेरन्धनं तस्य शेषास्तु स्त्रीधनं विना ॥ २५ ॥ सन्तान अथवा पुत्रहीन भाई के मर जाने पर अथवा उसके संन्यासी हो जाने पर उसके स्त्रीधन को छोड़कर शेष भाग को सभी भाइयों को बराबर बांट लेना चाहिए। भरणं चास्य कुर्वीरन् स्त्रीणामाजीवितक्षयात् । रक्षन्ति शय्यां भर्तुश्चेदाच्छिन्द्युरितरासु च ॥ २६ ॥ मृत भाई की साध्वी एवं आचारपरायण पत्नी का जीवनपर्यन्त भरण-पोषण करना, उसका भाग पाने वाले भाइयों का नैतिक एवं वैधिक (कानूनी) दायित्व है। हां, स्त्री के कुलटा होने पर तो उसके पास के धन को भी छीन लेना चाहिए तथा उसे घर से बाहर निकाल देना चाहिए। या तस्य दुहिता तस्याः पित्र्यँऽशो भरणे मतः । वासंस्कारं भजेरंस्तां परतो विभृयात् पतिः ॥ २७ ॥ मृत भाई (अथवा विधवा भाभी) की लड़की आदि के भरण-पोषण तथा विवाह आदि संस्कार पर होने वाला व्यय, पैतृक-सम्पत्ति में उसके भाग से पृथक्- सुरक्षित रखना चाहिए। विवाह से पूर्व भतीजी की रक्षा और उसके भरण-पोषण का दायित्व उसके चाचाओं पर होता है। विवाह के उपरान्त इस दायित्व को उसका पति ही वहन करता है। मृते भर्तर्यपुत्रायाः पतिपक्षः प्रभुः स्त्रियाः । विनियोगात्मरक्षासु भरणे च स ईश्वरः ॥ २८ ॥ पुत्रहीना स्त्री के विधवा हो जाने पर पति के परिवार वाले-श्वसुर, ज्येष्ठ और देवर आदि-ही उसके स्वामी होते हैं। उसके भरण पोषण एवं उसकी सुरक्षा का दायित्व निभाने वालों को यह भी अधिकार है कि वह उनकी अनुमति के बिना लेन-देन से सम्बन्धित कोई भी व्यापार आदि न करे; क्योंकि हानि होने पर भुगतान का भार भी उन पर ही पड़ता है। 230 / नारदस्मृति