भारतकोश
नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)

Narada Smriti with Hindi Translation

देवर्षि नारद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished304 पृष्ठ

पृष्ठ 253, कुल 304 में से

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पृष्ठ 253

एक द्यूतशाला में पराजित घोषित व्यक्ति को किसी दूसरी द्यूतशाला में द्यूतक्रीड़ा की अनुमति नहीं मिलती। द्यूत में पराजित व्यक्ति द्वारा धन देने से मुकरने की आशंका को समाप्त करने के लिए दोनों खिलाड़ियों से पहले ही दांव में लगायी धनराशि रखवा ली जाती है। इसी प्रकार विजेता द्वारा सभिक को उसका भाग देने से नकारने की आशंका को निर्मूल करने के लिए सभिक द्वारा अपना भाग पहले से काटकर शेष राशि विजेता को सौंपी जाती है। कूटाक्षदेविनः पापान्निहरेद् द्यूतमण्डलात्। कण्ठेऽक्षमालामासज्य स ह्येषु विनयः स्मृतः ॥ 6 ॥ द्यूत-क्रीड़ा में बेईमानी तथा छल कपट अथवा धोखा करने वाले के गले में अक्षमाला डालकर उसे द्यूतशाला से बाहर निकाल देना चाहिए। यही धूर्तता का दण्ड है। अनिर्दिष्टस्तु यो राज्ञा द्यूतं कुर्वीत मानवः। न स तं प्राप्नुयात् काम विनयं चैव सोऽर्हति ॥ 7 ॥ राजा से अनुमति (लायसेंस) प्राप्त किये बिना द्यूतशाला चलाने वाले को द्यूत खेलने वालों से कमीशन लेने का कोई अधिकार नहीं बनता। सत्य तो यह है कि राज-कर की चोरी करने वाला ऐसा व्यक्ति दण्ड का पात्र होता है। अथवा कितवा राज्ञे दत्त्वा भागं यथोदितम्। प्रकाशं देवनं कुर्युरेवं दोषो न विद्यते ॥ 8 ॥ इसके विपरीत राजा से अनुमति प्राप्त द्यूतशाला का सञ्चालक सभिक यदि विजेता से प्राप्त राशि में से कुछ अंश का भुगतान राजा को भी करता है, तो उसे खुले में भी खिलाड़ियों को द्यूत खिलाने की छूट होती है। इसके लिए उसे दोष नहीं दिया जाता। ॥ चतुर्थ अध्याय का षोडश प्रकरण समाप्त ॥ नारदस्मृति / 251