नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 273, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंदण्ड नहीं देना चाहिए। राजा को अधिक-से-अधिक किल्विषी (पापकर्मा) ब्राह्मण को अपने देश से निर्वासित कर देना चाहिए। सर्वस्वं वा हरेद्राजा चतुर्थं वाऽवशेषयेत्। एतेभ्योऽनुस्मरन्धर्मं प्राजापत्यमिति स्थितिः॥ 42 ॥ राजा को प्रयत्न करने पर भी न सुधरने वाले और देश से निकलने को असहमत ब्राह्मण की सम्पत्ति छीन लेनी चाहिए अथवा उसकी सम्पत्ति का चौथा भाग उसके निर्वाह के लिए छोड़कर शेष पर अपना अधिकार कर लेना चाहिए। ऐसा करते समय राजा को दुखी मन से यह कहना चाहिए कि प्रजापति द्वारा विहित धर्म की रक्षा के लिए, उसे न चाहते हुए भी ऐसा करना पड़ रहा है-देवता उसे क्षमा करें। ब्राह्मणस्यापराधेसु चतुर्ध्वङ्को विधीयते। गुरुतल्पे सुरापाने स्तेयं ब्राह्मणहिंसने ॥ 43 ॥ ब्राह्मण द्वारा सुरापान, गुरुपत्नी-गमन, स्तेय तथा ब्रह्महत्या आदि निकृष्ट एवं जघन्य कार्यों के किये जाने पर भी उसके शरीर पर इन अपराधों के सूचक चार प्रकार के चिह्नों को अंकित करना चाहिए। इसके अतिरिक्त उसे अन्य किसी प्रकार का आर्थिक अथवा शारीरिक दण्ड नहीं देना चाहिए। गुरुतल्पे भगः कार्यः सुरापाने ध्वजः स्मृतः। स्तेये तु श्वपदं कृत्वा शिशिपितेन पूरयेत्॥ 44 ॥ सुरापान करने वाले ब्राह्मण के मस्तक पर ध्वजा का, गुरुपत्नी-गमन करने वाले के मस्तक पर भग का तथा चोरी करने पर कुत्ते के पद का चिह्न बनाना चाहिए। कुरेदे हुए चिह्न के भीतर मोरपित्त-मोरपंख की राख-भर देनी चाहिए, जिससे ऐसा चिह्न कभी मिट अथवा लुप्त न हो सके, अपितु स्थायी रूप से सबको दीखता रहे, ताकि लोग उसका बहिष्कार करने में भूल-चूक न कर सकें। अशिरः पुरुषः कार्यो ललाटे ब्रह्मघातिनः। असम्भाष्यश्च कर्त्तव्यस्तन्मनोरनुशासनम् ॥ 45 ॥ ब्रह्महत्या करने वाले ब्राह्मण के मस्तक पर उसके इस पाप के सूचक मस्तकविहीन (सिरकटे) पुरुष का चिह्न अंकित किया जाता है। महाराज मनु का स्पष्ट निर्देश है कि इन चारों प्रकार के अपराधी ब्राह्मणों का सामाजिक बहिष्कार कर देना चाहिए। यहां तक कि उनके साथ बातचीत भी नहीं करनी चाहिए। राजा स्तेनेन गन्तव्यो मुक्तकेशेन धावता। आचक्षाणेन तत्स्तेयमेवंकर्मास्मि शाधि माम् ॥ 46 ॥ अनेना भवति स्तेनः स्वकर्मप्रतिपादनात्। राजा तत्स्पृशेदेनमुत्सृजेत्तु ह्यकिल्बिषम् ॥ 47 ॥ नारदस्मृति / 271