नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 275, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरन्तु ऊपर से सज्जन बने, अर्थात् प्रच्छन्न धूर्तों को सुधारने का दायित्व तो विवस्वान् (सूर्य) के पुत्र यमराज ही करते हैं, अर्थात् वे ही ऐसे दुष्ट-कपटी जनों को अनेक प्रकार की नरक यातनाएं देकर उन्हें सचेत करते रहते हैं। अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्बिषम्। द्विराष्टापाद्यं वैश्यस्य द्वात्रिंशत् क्षत्रियस्य तु॥ 51 ॥ ब्राह्मणस्य चतुःषष्टीत्येवं स्वायम्भुवोऽब्रवीत्। विद्यापि च विशेषेण विद्वत्स्वभ्यधिकं भवत्॥ 52 ॥ महर्षि मनु के अनुसार मूर्खों द्वारा किये गये अपराध का दण्ड समझदारों द्वारा किये जाने वाले अपराध के दण्ड की तुलना में कम होता है। मूर्ख तो मूर्ख है। उसके द्वारा किया अपराध मूर्खता है। उसे तो अच्छे-बुरे की परख ही नहीं, परन्तु विवेकशील व्यक्ति भी मूर्खों के समान आचरण अथवा उनका अनुसरण करता है, तो निश्चित है कि उसे अधिक दण्ड मिलना चाहिए। मूर्खों द्वारा किये अपराध का तो कोई समर्थन नहीं करता, परन्तु विवेकशील व बुद्धिमानों द्वारा किया ग़लत-सही कार्य तो दूसरों के लिए उदाहरण बन जाता है। यही कारण है कि मनु महाराज ने एक ही अपराध के लिए विभिन्न वर्णों के लोगों के लिए भिन्न-भिन्न दण्ड की व्यवस्था दी है। उदाहरणार्थ, चोरी के लिए शूद्र से चोरी के सामान का आठ गुणा, वैश्य से सोलह गुणा, क्षत्रिय से बत्तीस गुणा और ब्राह्मण से चौंसठ गुणा दाम दण्ड के रूप में वसूल करना चाहिए; क्योंकि विद्या-विवेकसम्पन्न बुद्धिमानों का अपराध और दण्ड अधिक ही होता है। शारीरश्चार्थदण्डश्च दण्डस्तु द्विविधः स्मृतः। शारीरं दशधा प्रोक्तमर्थदण्डस्त्वनेकधा ॥ 53 ॥ अपराध के लिए दिये जाने वाले दण्ड के दो रूप हैं- 1. शारीरिक तथा 2. आर्थिक। शारीरिक दण्ड के दस और आर्थिक दण्ड के अनेक रूप-भेद हैं। काकिण्यादिस्त्वर्थदण्डः सर्वस्वान्तस्तथैव च। शारीरः सन्निरोधादिर्जीवितान्तस्तथैव च॥ 54 ॥ बन्दी बनाने से लेकर मृत्यु-दण्ड देने तक मारना-पीटना आदि यातनाएं शारीरिक दण्ड के अन्तर्गत आती हैं तथा कौड़ी से लेकर सर्वस्व (सारी सम्पत्ति) का हरण आर्थिक दण्ड है। काकिण्यादिस्तु यो दण्डः स तु भाषावरः स्मृतः। भाषावराद् योऽयं प्रोक्तः कार्षापणपरस्तु सः॥ 55 ॥ उत्तर भारत में लेन-देन में काकिणी अथवा वराटिका (कौड़ियों) का प्रचलन है, परन्तु दक्षिण भारत में लेन-देन के रूप में प्रचलित मुद्रा कार्षापण (लोहे का सिक्का) कहलाती है। वैसे काकिणी से अधिक मूल्य की मुद्रा माष और माष से नारदस्मृति / 273