नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 37, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंसापदेशं हरन्कालमब्रुवंश्चापि संसदि। उक्ता वाचो विब्रुवंश्च हीयमानस्य लक्षणम्॥ 58 ॥ न्यायाधिकारी द्वारा न्यायालय में पूछे गये प्रश्नों का सीधे-सीधे और तत्काल उत्तर न देकर टालमटोल करने वाले, बहाना बनाने वाले, मौन खड़े रहने वाले अथवा अपनी ही पूर्वोक्त कथन से मुकर जाने वाले को हीनवादी (दुर्बल पक्ष) समझना चाहिए। वादी के इस व्यवहार को उसकी पराजय का प्रथम लक्षण मानना चाहिए। पलायते य आहूतः प्राप्तश्च विवदेन यः। विनेयः स भवेद्राज्ञा हीन एव स वादतः ॥ 59 ॥ राजा द्वारा बुलाये जाने पर भाग खड़ा होने वाले (आज की भाषा में समन लेने से इनकार करने वाले अथवा समन लाने वाले को घूस देकर वापस लौटा देने वाले अथवा उसे देखते ही खिसक जाने वाले) तथा यत्न द्वारा बलपूर्वक पकड़े जाने पर निरर्थक कलह करने वाले को न केवल दण्डित करना चाहिए, अपितु ऐसे व्यक्ति को दुर्बल पक्ष समझते हुए हीन (पराजित) वादी भी घोषित कर देना चाहिए। टिप्पणी — याज्ञवल्क्यस्मृति में भी दोमुखी बात करने वाले, मनमानी करने वाले तथा राज्य द्वारा बुलाये जाने पर उपस्थित न होने वाले को दण्डनीय और हीन (पराजित) माना गया है— सन्दिग्धार्थं स्वतन्त्रो यः साधयेद्यश्च निष्पतेत्। न चाहूतो वदेत् किञ्चिद्धीनो दण्ड्यश्च सः स्मृतः॥ सम्यक्प्रणिहितं चार्थं पृष्टः सन्नाभिनन्दति। अपदिश्य च यो देश्यं पुनस्तमनुधावति ॥ 60 ॥ अपने विवाद-विषय को सोच-समझकर और तर्क-युक्ति-संगत बनाकर प्रस्तुत करने वाले, परन्तु न्यायाधिकारियों (ज्यूरी के सदस्यों) द्वारा पूछे जाने पर कभी एक समय अपने पक्ष में किसी लिखित प्रमाण और साक्ष्य आदि के न होने और फिर दूसरे समय प्रमाण और साक्ष्य आदि का होना बताने वाले, अर्थात् अस्थिर बुद्धि और अनिश्चित भाव वाले वादी को भी हीन, झूठा एवं पराजित घोषित करना चाहिए। सन्ति ज्ञातार इत्युक्त्वा दिशेत्युक्तो दिशेन यः। एतैस्तु कारणैः सर्वैर्धर्महीनान् विनिर्दिशेत् ॥ 61 ॥ न्यायाधिकरण में अपने विवाद को प्रस्तुत करते समय वादी अपने पक्ष में लिखित प्रमाण और साक्ष्य आदि का उल्लेख तो करता है, परन्तु न्यायालय द्वारा प्रमाण और साक्ष्य दिखाने के आदेश मिलने पर उन्हें उपस्थित नहीं करता, तो ऐसे वादी के व्यवहार को अपुष्ट एवं न्यायविरुद्ध मानते हुए उसे निरस्त कर देना चाहिए। नारदस्मृति / 35