नारद स्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
Narada Smriti with Hindi Translation
देवर्षि नारद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 88, कुल 304 में से
संदर्भ में पढ़ेंरखी गयी हैं—1. उपभोग की अवधि बीस वर्ष अथवा उससे अधिक होनी चाहिए तथा 2. उपभोग सर्वजनविदित होना चाहिए, गुप्त रूप से किया गया क़ब्ज़ा मान्य नहीं होता। यहां इस तथ्य को विस्मरण नहीं करना चाहिए कि प्राचीनकाल में स्त्री को भी—पुरुष, पिता, पति आदि का—निजी धन माना जाता था। उसका स्वामी उसे बन्धक रखने, बेचने, दांव पर लगाने आदि को स्वतन्त्र था। स्त्री का कोई स्वतन्त्र व्यक्तित्व नहीं था, वह अपने स्वामी के आदेश का पालन करने को बाध्य थी। उसकी स्थिति पशु अथवा दास के समान ही थी। ऐसा केवल हिन्दू धर्म में ही नहीं था, अन्य धर्मों में भी यही कुछ है। इस्लाम के अनुसार तो वह 'जिंस' (Property) है, उसमें रूह (आत्मा) तो है ही नहीं। इसी सन्दर्भ में स्मृतिकार का मन्तव्य दर्शनीय है। स्त्रीधनं च नरेन्द्रणां न कथञ्चन जीर्यते। अनागमं भुज्यमानं वत्सराणां शतैरपि ॥ 83 ॥ दोनों—स्त्रीधन और राजकीय सम्पत्ति (भूमि, भवन आदि)—का निरन्तर प्रत्यक्ष रूप से सौ वर्षों तक भोग करने वाला व्यक्ति भी उनका स्वामी नहीं बन पाता। हां, इस सम्बन्ध में यदि किसी प्रकार का कोई लिखित अनुबन्ध (Agreement) कर लिया जाता है, तो स्थिति भिन्न हो जाती है, अर्थात् तब उपभोक्ता स्वामित्व प्राप्त कर लेता है। सम्भोगो दृश्यते यत्र न दृश्येतागमः क्वचित्। आगमः कारणं तत्र न भोगस्तत्र कारणम् ॥ 84 ॥ इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए स्मृतिकार का कथन है—जिस सम्पत्ति पर उपभोक्ता का क़ब्ज़ा तो है, परन्तु उसके पास किसी प्रकार का कोई लिखित दस्तावेज़ नहीं है, तो उस स्थिति में भोग (क़ब्ज़ा) को कोई महत्त्व नहीं दिया जा सकता; क्योंकि लिखित अनुबन्ध ही स्वामित्व का मूल-आधार है, क़ब्ज़ा नहीं। ऐसा व्यक्ति अनिश्चित अवधि तक सम्पत्ति का उपभोग करता रह सकता है, परन्तु स्वामी होने का अधिकार कभी नहीं पा सकता। आगमेन विशुद्धेन भोगो याति प्रमाणताम्। अविशुद्धागमो भोगः प्रामाण्यं नैव गच्छति ॥ 85 ॥ लिखित प्रमाण (दस्तावेज़) भी तभी मान्य होता है, जब वह पूर्णतः विशुद्ध हो, अर्थात् लेने-देने वालों के नाम, पिता का नाम, पता ठिकाना, सम्पत्ति का विवरण, देने की तिथि, दिन, मास और वर्ष, बदले में लिया दिया धन एवं शर्तें आदि सब कुछ का उल्लेख हो और लेन-देन करने वाले स्वस्थ मस्तिष्क की स्थिति में हों तथा लेन-देन बिना किसी दबाव, विवशता और नशे में किया गया 86 / नारदस्मृति