भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 10, कुल 318 में से

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पृष्ठ 10

ॐ नमो भगवते श्रीनृसिंहाय नमः श्रीनरसिंहपुराण पहला अध्याय प्रयागमें ऋषियोंका समागम; सूतजीके प्रति भरद्वाजजीका प्रश्न; सूतजीद्वारा कथारम्भ और सृष्टिक्रमका वर्णन

॥ श्रीलक्ष्मीनृसिंहाय नमः ॥ श्रीवेदव्यासाय नमः ॥ नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्। देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥ १ तप्तहाटककेशान्तज्वलत्पावकलोचन । वज्राधिकनखस्पर्श दिव्यसिंह नमोऽस्तु ते॥ २ पान्तु वो नरसिंहस्य नखलाङ्गूलकोटयः। हिरण्यकशिपोर्वक्षःक्षेत्रासृक्कर्दमारुणाः ॥ ३ हिमवद्द्वासिनः सर्वे मुनयो वेदपारगाः। त्रिकालज्ञा महात्मानो नैमिषारण्यवासिनः ॥ ४ येऽर्बुदारण्यनिरताः पुष्करारण्यवासिनः। महेन्द्राद्रिरता ये च ये च विन्ध्यनिवासिनः ॥ ५ धर्मारण्यरता ये च दण्डकारण्यवासिनः। श्रीशैलनिरता ये च कुरुक्षेत्रनिवासिनः॥ ६ कौमारपर्वते ये च ये च पम्पानिवासिनः। एते चान्ये च बहवः सशिष्या मुनयोऽमलाः॥ ७ माघमासे प्रयागं तु स्नातुं तीर्थं समागताः। तत्र स्नात्वा यथान्यायं कृत्वा कर्म जपादिकम् ॥ ८

अन्तर्यामी भगवान् नारायण ( श्रीकृष्ण) उनके सखा नरश्रेष्ठ नर (अर्जुन) तथा इनकी लीला प्रकट करनेवाली सरस्वती देवीको नमस्कार करनेके पश्चात् 'जय' (इतिहास-पुराण)-का पाठ करे ॥ १ ॥ दिव्य सिंह ! तपाये हुए सुवर्णके समान पीले केशोंके भीतर प्रज्वलित अग्निकी भाँति आपके नेत्र देदीप्यमान हो रहे हैं तथा आपके नखोंका स्पर्श वज्रसे भी अधिक कठोर है, इस प्रकार अमित प्रभावशाली आप परमेश्वरको मेरा नमस्कार है। भगवान् नृसिंहके नखरूपी हलके अग्रभाग, जो हिरण्यकशिपु नामक दैत्यके वक्षःस्थलरूपी खेतकी रक्तमयी कीचड़के लगनेसे लाल हो गये हैं, आप लोगोंकी रक्षा करें ॥ २-३ ॥ एक समय हिमालयकी घाटियोंमें रहनेवाले, वेदोंके पारगामी एवं त्रिकालवेत्ता समस्त महात्मा मुनिगण नैमिषारण्य, अर्बुदारण्य और पुष्करारण्यके निवासी मुनि, महेन्द्र पर्वत और विन्ध्यगिरिके निवासी ऋषि, धर्मारण्य, दण्डकारण्य, श्रीशैल और कुरुक्षेत्रमें वास करनेवाले मुनि तथा कुमार पर्वत एवं पम्पासरके निवासी ऋषि—ये तथा अन्य भी बहुत-से शुद्ध हृदयवाले महर्षिगण अपने शिष्योंके साथ माघके महीनेमें स्नान करनेके लिये प्रयाग-तीर्थमें आये ॥ ४-७१/२ ॥ वहाँपर यथोचित रीतिसे स्नान और जप आदि करके

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