भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 130, कुल 318 में से

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पृष्ठ 130

अध्याय ३३ ] भगवान्‌के मन्दिरमें झाडू देने और उसको लीपनेका महान् फल ११९ इत्याकर्ण्य वचः क्लीबं पाण्डवा जातसम्भ्रमाः । | इस प्रकारके कातर वचन सुनकर पाण्डव हड़बड़ा यान्ति रोमाञ्चिता भूयो विधायौग्निं च तं मुनिम् ॥ ३२ | गये। वे रोमाञ्चित हो, आग जलाकर उस मुनिके पीछे चले। द्रौपदीको उन लोगोंने पहलेवाले महात्मा मुनिके विमुच्य द्रौपदीं तत्र मुनेः पार्श्वे महात्मनः । | पास ही छोड़ दिया और स्वयं रोषसे भरकर वहाँसे ततो दूरतरं प्राप्ताः संरम्भात्ते च पाण्डवाः ॥ ३३ | बहुत दूर निकल गये॥ ३२-३३॥ तदनन्तर युधिष्ठिरने कहा—हमें तो यहाँ कुछ भी ततो युधिष्ठिरोऽवोचत् किं च नो नात्र दृश्यते । | दिखायी नहीं देता। अर्जुन ! तुम द्रौपदीकी रक्षाके लिये कृष्णासंरक्षणार्थाय व्रज व्यावृत्य चार्जुन ॥ ३४ | यहाँसे लौट जाओ। तब भाईके वचनसे प्रेरित होकर अर्जुन वहाँसे चल दिये। राजन् ! फिर राजा युधिष्ठिरने ततोऽर्जुनो विनिष्क्रान्तो बन्धुवाक्यप्रणोदितः । | उस गहन वनके भीतर सूर्यमण्डलकी ओर देखकर यह ततो युधिष्ठिरो राजा सत्यां वाचमकल्पयत् ॥ ३५ | सत्य वचन कहा—मेरी सत्यवादिता, पुण्यकर्म तथा धर्मपूर्वक भाषण करनेसे संतुष्ट होकर देवगण संशयमें निरीक्ष्य मण्डलं भानोस्तदा सुगहने वने । | पड़े हुए मुझको सत्य बात बतला दें॥ ३४-३६१/२॥ मम सत्याच्च सुकृताद् धर्मसम्भाषणात् प्रभो ॥ ३६ राजन् ! युधिष्ठिरके यों कहनेपर आकाशमें इस तथ्यं शंसन्तु त्रिदशा मम संशयभाजिनः । | प्रकारका शब्द हुआ, यद्यपि वहाँ बोलनेवाला कोई ततोऽम्बरेऽभवद्वाणी तदा भूपाशरीरिणी ॥ ३७ | व्यक्ति नहीं था—महाराज ! यह (जो आपके पास खड़ा है, वह मुनि नहीं) दानव है। स्थूलशिरा नामक मुनि दानवोऽयं महाराज मुनिः स्थूलशिराः स्थितः । | तो सुखपूर्वक हैं, उनपर किसीके द्वारा कोई उपद्रव नहीं नासावुपद्रुतः केन मायैषास्य दुरात्मनः ॥ ३८ | है। यह तो इस दुष्टकी माया है॥ ३७-३८॥ ततो भीमः कराघातैर्नश्यमानं हि दानवम् । | तब भीमने अत्यन्त क्रोधसे युक्त हो उस भागते हुए संरम्भात्कुपितोऽत्यर्थं मौलिदेशे जघान तम् ॥ ३९ | दानवके मस्तकपर बड़े वेगसे मुष्टिप्रहार किया। फिर तो दानवने भी अपना रौद्ररूप धारण किया और भीमको सोऽपि रूपं निजं प्राप्य रौद्रं भीममताडयत् । | मुक्का मारा। इस प्रकार भीम और दानवमें वहाँ दारुण तत्र युद्धं प्रवृत्तं दारुणं भीमदैत्ययोः ॥ ४० | संग्राम छिड़ गया। भीमने उस वनमें बड़े कष्टसे उसके स्थूल मस्तकका छेदन किया॥ ३९-४०१/२॥ कष्टाद्बभञ्ज भीमोऽपि तस्य स्थूलं शिरो वने । | इधर अर्जुन भी जब मुनिके आश्रमपर पहुँचे, तब अर्जुनोऽपि समायातो नैव पश्यति तं मुनिम् ॥ ४१ | वहाँ उन्हें न तो वह मुनि दिखायी दिया और न प्राणप्रिया साध्वी भार्या द्रौपदी ही दीख पड़ी। तब तथा च द्रौपदीं भूयः साध्वीं कान्तां च वल्लभाम् । | अर्जुनने वृक्षपर चढ़कर ज्यों ही इधर-उधर दृष्टि ततो वृक्षं समारुह्य यावत्पश्यति चार्जुनः ॥ ४२ | डाली, त्यों ही देखा कि एक दानव द्रौपदीको अपने कंधेपर बिठाकर बड़ी शीघ्रतासे भागा जा रहा है और तावद्विधाय तां स्कन्धे शीघ्रं धावति दानवः । | उस दुष्टके द्वारा हरी गयी द्रौपदी कुररीकी भाँति संहृता याति दुष्टेन रुदती कुररी यथा ॥ ४३ | ‘हा धर्मपुत्र! हा भीम!’ इत्यादि रटती हुई विलाप कर रही है। द्रौपदीको उस अवस्थामें देखकर वीर कुर्वती भीमभीमेति धर्मपुत्रेति वादिनी । | अर्जुन अपनी आवाजसे दिशाओंको गुँजाते हुए चले। तां दृष्ट्वा स ययौ वीरः शब्दैः संनादयन् दिशः ॥ ४४ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

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