संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 143, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१३२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३७
[संस्कृत मूल पाठ]
मार्कण्डेय उवाच इत्थं स्तुतस्तदा तेन शङ्खचक्रगदाधरः। ब्रह्माणमाह देवेशो दास्ये ते ज्ञानमुत्तमम् ॥ १७ इत्युक्त्वा तु तदा विष्णुश्चिन्तयामास पार्थिव । केनास्य नीतं विज्ञानं केन रूपेण चादधे ॥ १८ मधुकैटभकृतं सर्वमिति ज्ञात्वा जनार्दनः । मात्स्यं रूपं समास्थाय बहुयोजनमायतम्। बहुयोजनविस्तीर्णं सर्वज्ञानमयं नृप ॥ १९ स प्रविश्य जलं तूर्णं क्षोभयामास तद्धरिः । प्रविश्य च स पातालं दृष्टवान्मधुकैटभौ ॥ २० तौ मोहयित्वा तुमुलं तज्ज्ञानं जगृहे हरिः । वेदशास्त्राणि मुनिभिः संस्तुतो मधुसूदनः ॥ २१ आनीय ब्रह्मणे दत्त्वा त्यक्त्वा तन्मात्स्यकं नृप। जगद्धिताय स पुनर्योगनिद्रावशं गतः ॥ २२ ततः प्रबुद्धौ संक्रुद्धौ तावुभौ मधुकैटभौ । आगत्य ददृशाते तु शयानं देवमव्ययम् ॥ २३ अयं स पुरुषो धूर्त्त आवां सम्मोह्य मायया । आनीय वेदशास्त्राणि दत्त्वा शेतेऽत्र साधुवत् ॥ २४ इत्युक्त्वा तौ महाघोरौ दानवौ मधुकैटभौ । बोधयामासतुस्तूर्णं शयानं केशवं नृप ॥ २५ युद्धार्थमागतावत्र त्वया सह महामते। आवयोर्देहि संग्रामं युध्यस्वोत्थाय साम्प्रतम् ॥ २६ इत्युक्तो भगवांस्ताभ्यां देवदेवो नृपोत्तम। तथेति चोक्त्वा तौ देवः शाङ्गं सज्यमथाकरोत् ॥ २७ ज्याघोषतलघोषेण शङ्खशब्देन माधवः । खं दिशः प्रदिशश्चैव पूरयामास लीलया ॥ २८ तौ च राजन् महावीर्यौ ज्याघोषं चक्रतुस्तदा । युयुधाते महाघोरौ हरिणा मधुकैटभौ ॥ २९ कृष्णश्च युयुधे ताभ्यां लीलया जगतः पतिः। समं युद्धमभूद्देवं तेषामस्त्राणि मुञ्चताम् ॥ ३०
[हिन्दी अनुवाद]
**मार्कण्डेयजी बोले—**ब्रह्माजीके इस प्रकार स्तुति करनेपर शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले देवेश्वर विष्णुने उनसे कहा—'मैं तुम्हें उत्तम ज्ञान प्रदान करूँगा।' राजन्! भगवान् विष्णु यों कहकर तब सोचने लगे— 'कौन इसका विज्ञान हर ले गया और किस रूपसे उसने उसे धारण कर रखा है?' भूपाल! अन्तमें यह जानकर कि यह सब मधु और कैटभकी करतूत है, भगवान् जनार्दनने अनेकों योजन लंबा-चौड़ा पूर्णज्ञानमय मत्स्यरूप धारण किया। फिर मत्स्यरूपधारी हरिने तुरंत ही जलमें प्रविष्ट होकर उसे क्षुब्ध कर डाला और भीतर-ही-भीतर पाताललोकमें पहुँचकर मधु तथा कैटभको देखा। तब मुनियोंद्वारा स्तवन किये जानेपर भगवान् मधुसूदनने मधु और कैटभ—दोनोंको मोहितकर वह वेदशास्त्रमय ज्ञान ले लिया और उसे ले आकर ब्रह्माजीको दे दिया। राजन् ! तत्पश्चात् वे भगवान् उस मत्स्यरूपको त्यागकर जगत्के हितके लिये पुनः योगनिद्रामें स्थित हो गये॥ १७—२२ ॥
तदनन्तर मोह निवृत्त होनेपर [वेद-शास्त्रको न देख] मधु तथा कैटभ—दोनों ही बहुत कुपित हुए और वहाँसे आकर उन्होंने अविनाशी भगवान् विष्णुको सोते देखा। तब वे परस्पर कहने लगे—'यह वही धूर्त पुरुष है, जिसने हम दोनोंको मायासे मोहित करके वेद-शास्त्रोंको ले आकर ब्रह्माको दे दिया और अब यहाँ साधुकी भाँति सो रहा है।' राजन्! यों कहकर उन महाघोर दानव मधु और कैटभने वहाँ सोये हुए भगवान् केशवको तत्काल जगाया और कहा—'महामते! हम दोनों यहाँ तुम्हारे साथ युद्ध करने आये हैं; तुम हमें संग्रामकी भिक्षा दो और अभी उठकर हमसे युद्ध करो'॥ २३—२६ ॥
नृपवर ! उनके इस प्रकार कहनेपर देवदेव भगवान्ने 'बहुत अच्छा' कहकर अपने शार्ङ्ग धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी। उस समय भगवान् माधवने लीलापूर्वक धनुषकी टंकार और शङ्खनादसे आकाश, दिशाओं और अवान्तर-दिशाओं (कोणों)-को भर दिया ॥ २७-२८ ॥
राजन्! फिर उन महापराक्रमी महाभयानक मधु और कैटभने भी उस समय अपनी प्रत्यञ्चाको टंकार दी और वे भगवान् विष्णुके साथ युद्ध करने लगे। जगत्पति भगवान् विष्णु भी लीलासे ही उनके साथ युद्ध करने
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