संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 161, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१५० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४२ [संस्कृत श्लोक] अचिन्त्यः स्तूयते यत्र भक्त्या भक्तेप्सितप्रदः। अर्थशास्त्रेण किं तात यत्र संसृतिसंततिः ॥ १३ शास्त्रश्रमेण किं तात येनात्मैव विहंस्यते। वैष्णवं वाङ्मयं तस्माच्छाव्यं सेव्यं च सर्वदा ॥ १४ मुमुक्षुभिर्भवक्लेशान्नो चेन्नैव सुखी भवेत्। इति तस्य वचः शृण्वन् हिरण्यकशिपुस्तदा ॥ १५ जज्वाल दैत्यराट् तप्तसर्पिर्ह्रद्विरिवाधिकम्। प्रह्लादस्य गिरं पुण्यां जनसंसृतिनाशिनीम् ॥ १६ नामृष्यतासुरः क्षुद्रो घूको भानुप्रभामिव। परितो वीक्ष्य सम्प्राह क्रुद्धो दैत्यभटानिदम् ॥ १७ हन्यतामेष कुटिलः शस्त्रपातैः सुभीषणैः। उत्कृत्योत्कृत्य मर्माणि रक्षितास्तु हरिः स्वयम् ॥ १८ पश्यत्विदानीमेवैष हरिसंस्तवजं फलम्। काकोलकाङ्गगृध्रेभ्यो ह्यस्याङ्गं संविभज्यताम् ॥ १९ अथोद्धतास्त्रा दैतेयास्तर्जयन्तः प्रगर्जितैः। अच्युतस्य प्रियं भक्तं तं जघ्नुः पतिनोदिताः ॥ २० प्रह्लादोऽपि प्रभुं नत्वा ध्यानवज्रं समाददे। अकृत्रिमरसं भक्तं तमित्थं ध्याननिश्चलम् ॥ २१ ररक्ष भगवान् विष्णुः प्रह्लादं भक्तदुःखहृत्। अथालब्धपदान्यस्य गात्रे शस्त्राणि रक्षसाम् ॥ २२ नीलाब्जशकलानीव पेतुश्छिन्नान्यनेकधा। किं प्राकृतानि शस्त्राणि करिष्यन्ति हरिप्रिये ॥ २३ तापत्रयमहास्त्रौघः सर्वोऽप्यस्माद् बिभेति वै। पीडयन्ति जनांस्तावद् व्याधयो राक्षसा ग्रहाः ॥ २४ यावद् गुहाशयं विष्णुं सूक्ष्मं चेतो न विन्दति। ते तु भग्नास्त्रशकलैः प्रतीपोत्थैरितस्ततः ॥ २५ हन्यमाना न्यवर्तन्त सद्यः फलददैरिव। न चित्रं विबुधानां तदज्ञानां विस्मयावहम् ॥ २६ [हिन्दी अनुवाद] और श्रवण करने योग्य काव्य है। जिसमें भक्तोंको अभीष्ट वस्तु देनेवाले अचिन्त्य परमेश्वरका भक्तिपूर्वक स्तवन किया जाता हो, वही शास्त्र है। तात ! उस अर्थशास्त्रसे क्या लाभ, जिसमें संसार-चक्रमें डालनेवाली ही बातें कही गयी हैं। पिताजी ! उस शास्त्रमें परिश्रम करनेसे क्या सिद्ध होगा, जिससे आत्माका ही हनन होता है; इसलिये मुमुक्षु पुरुषोंको सदा वैष्णव शास्त्रोंका ही श्रवण और सेवन करना चाहिये। अन्यथा सांसारिक कष्टसे छुटकारा नहीं मिलता और न मनुष्य सुखी ही हो पाता है ॥ ११–१४१/२ ॥ जिस प्रकार तपाया हुआ घी जलके छींटे पड़नेसे और अधिक प्रज्वलित हो उठता है, वैसे ही दैत्यराज हिरण्यकशिपु प्रह्लादकी उपर्युक्त बातें सुनकर क्रोधसे जल उठा। जैसे उल्लू सूर्यकी प्रभा नहीं देख सकता, उसी प्रकार वह क्षुद्र असुर जीवके संसार-बन्धनको नष्ट करनेवाली प्रह्लादकी पवित्र वाणी न सह सका। उस क्रोधीने चारों ओर देखकर दैत्य वीरोंसे कहा- ॥ १५-१७ ॥ 'अरे! इस कुटिलको शस्त्रोंके भयंकर आघातसे मार डालो, इसके मर्मस्थानोंके टुकड़े-टुकड़े कर दो; आज इसका भगवान् स्वयं आकर इसकी रक्षा करे। विष्णुकी स्तुति करनेका फल यह आज इसी समय अपनी आँखोंसे देखे। इसका अङ्ग-अङ्ग काटकर कौओं, काँकों और गिद्धोंको बाँट दो' ॥ १८-१९ ॥ तब अपने स्वामी हिरण्यकशिपुद्वारा प्रेरित दैत्यगण अपनी विकट गर्जनासे डराते हुए, हाथमें शस्त्र लेकर भगवान्के प्रिय भक्त उन प्रह्लादजीको मारने लगे। प्रह्लादने भी भगवान्को नमस्कार करके ध्यानरूपी वज्र ग्रहण किया। तब भक्तोंके दुःख दूर करनेवाले भगवान् विष्णु स्वभावतः प्रेम करनेवाले भक्त प्रह्लादको इस प्रकार ध्यानमें स्थिर देख उसकी रक्षा करने लगे। फिर तो राक्षसोंके चलाये हुए अस्त्र-शस्त्र प्रह्लादके शरीरमें स्पर्श किये बिना ही नील-कमलके टुकड़ोंकी भाँति खण्ड- खण्ड होकर गिर जाने लगे। भला, ये प्राकृत शस्त्र भगवान्के प्रिय भक्तका क्या कर सकते हैं। उससे तो सम्पूर्ण त्रितापरूपी महान् अस्त्रसमूह भी भय मानता है। व्याधि, राक्षस और ग्रह-ये तभीतक मनुष्योंको पीड़ा पहुँचाते हैं, जबतक उनका चित्त हृदय-गुहामें सूक्ष्मरूपसे स्थित भगवान् विष्णुको नहीं प्राप्त कर लेता। भक्तके अपमानका मानो तत्काल फल देनेवाले वे भग्न अस्त्रखण्ड उलटे चलकर दैत्योंका संहार करने लगे। इनसे पीड़ित होनेके कारण वे दैत्य इधर-उधर भाग गये। विद्वानोंकी दृष्टिमें ऐसा होना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है, अज्ञानीजनोंको ही इस घटनासे विस्मय हो सकता है ॥ २०-२६ ॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth