संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 212, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४९ ] श्रीरामका जयन्तको दण्ड देना; शरभङ्ग, सुतीक्ष्ण और अगस्त्यसे मिलना २०१ इत्युक्ते रावणेनाथ मारीचो वाक्यमब्रवीत्। त्वमेव गच्छ पापिष्ठ नाहं गच्छामि तत्र वै ॥ ६६ पुरैवानेन रामेण व्यथितोऽहं मुनेर्मखे। इत्युक्तवति मारीचे रावणः क्रोधमूर्च्छितः ॥ ६७ मारीचं हन्तुमारेभे मारीचोऽप्याह रावणम्। तव हस्तवधाद्वीर रामेण मरणं वरम् ॥ ६८ अहं गमिष्यामि तत्र यत्र त्वं नेतुमिच्छसि । अथ पुष्पकमारुह्य जनस्थानमुपागतः ॥ ६९ मारीचस्तत्र सौवर्णं मृगमास्थाय चाग्रतः। जगाम यत्र सा सीता वर्तते जनकात्मजा ॥ ७० सौवर्णं मृगपोतं तु दृष्ट्वा सीता यशस्विनी। भाविकर्मवशाद्राममुवाच पतिमात्मनः ॥ ७१ गृहीत्वा देहि सौवर्णं मृगपोतं नृपात्मज। अयोध्यायां तु मद्गेहे क्रीडनार्थमिदं मम ॥ ७२ तयैवमुक्तो रामस्तु लक्ष्मणं स्थाप्य तत्र वै। रक्षणार्थं तु सीताया गतोऽसौ मृगपृष्ठतः ॥ ७३ रामेण चानुयातोऽसौ अभ्यधावद्वने मृगः। ततः शरेण विव्याध रामस्तं मृगपोतकम् ॥ ७४ हा लक्ष्मणेति चोक्त्वासौ निपपात महीतले। मारीचः पर्वताकारस्तेन नष्टो बभूव सः ॥ ७५ आकर्ण्य रुदतः शब्दं सीता लक्ष्मणमब्रवीत्। गच्छ लक्ष्मण पुत्र त्वं यत्रायं शब्द उत्थितः ॥ ७६ भ्रातुर्ज्येष्ठस्य तत्त्वं वै रुदतः श्रूयते ध्वनिः। प्रायो रामस्य संदेहं लक्षयेऽहं महात्मनः ॥ ७७ इत्युक्तः स तथा प्राह लक्ष्मणस्तामनिन्दिताम्। न हि रामस्य संदेहो न भयं विद्यते क्वचित् ॥ ७८ रावणके यों समझानेपर मारीचने कहा—'अरे पापिष्ठ! तुम्हीं जाओ, मैं वहाँ नहीं जाऊँगा। मैं तो विश्वामित्रमुनिके यज्ञमें पहले ही श्रीरामके हाथों भारी कष्ट उठा चुका हूँ।' मारीचके यों कहनेपर रावण क्रोधसे मूर्च्छित हो उसे मार डालनेको उद्यत हो गया। तब मारीचने उससे कहा—'वीर! तुम्हारे हाथसे वध हो, इसकी अपेक्षा तो श्रीरामके हाथसे ही मरना अच्छा है। तुम मुझे जहाँ ले चलना चाहते हो, वहाँ अब मैं अवश्य चलूँगा' ॥ ६६-६८१/२ ॥ यह सुनकर वह पुष्पकविमानपर आरूढ हो उसके साथ जनस्थानके निकट आया। वहाँ पहुँचकर मारीच सुवर्णमय मृगका रूप धारणकर, जहाँ जनकनन्दिनी सीता विद्यमान थीं, वहाँ उनके सामने गया। उस सुवर्णमय मृगकिशोरको देखकर यशस्विनी सीता भावी कर्मके वशीभूत हो अपने पति भगवान् श्रीरामसे बोलीं—'राजपुत्र! आप उस सुवर्णमय मृगशावकको पकड़कर मेरे लिये ला दीजिये। यह अयोध्यामें मेरे महलके भीतर क्रीड़ा-विनोदके लिये रहेगा' ॥ ६९-७२ ॥ सीताके यों कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उनकी रक्षाके लिये लक्ष्मणको वहाँ रख दिया और स्वयं उस मृगके पीछे चले। श्रीरामके पीछा करनेपर वह मृग वनकी ओर भागा, तब श्रीरामने उस मृगशावकको बाणसे बींध डाला। मारीच 'हा! लक्ष्मण!'—यों कहकर पर्वताकार शरीरसे पृथ्वीपर गिरा और प्राणहीन हो गया। रोते हुए मारीचके उस आर्तनादको सुनकर सीताने लक्ष्मणसे कहा—'वत्स लक्ष्मण! जहाँसे यह आवाज आयी है, वहीं तुम भी जाओ। निश्चय ही तुम्हारे ज्येष्ठ भ्राताके रोदनका शब्द कानोंमें आ रहा है, मुझे प्रायः महात्मा श्रीरामका जीवन संशयमें पड़ा दिखायी देता है' ॥ ७३-७७ ॥ सीताकी यह बात सुनकर उन अनिन्दिता देवीसे लक्ष्मणने कहा—'देवि! श्रीरामके लिये कोई संदेहकी बात नहीं है, उन्हें कहीं भी भय नहीं है।' In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth