संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 214, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४९ ] श्रीरामका जयन्तको दण्ड देना; शरभङ्ग, सुतीक्ष्ण और अगस्त्यसे मिलना २०३ एवं प्रलपमानायाः सीतायास्तन्महत्स्वनम्। इस प्रकार उच्चस्वरसे विलाप करती हुई सीताके उस आकर्ण्य गृध्रराजस्तु जटायुस्तत्र चागतः॥ ९२ महान् आर्तनादको सुनकर गृध्रराज जटायु वहाँ आ पहुँचे (और बोले-) 'अरे दुष्टात्मा रावण! ठहर जा; तू तिष्ठ रावण दुष्टात्मन् मुञ्च मुञ्चात्र मैथिलीम्। सीताको छोड़ दे, छोड़ दे।' यह कहकर पराक्रमी जटायु इत्युक्त्वा युयुधे तेन जटायुस्तत्र वीर्यवान्॥ ९३ उसके साथ युद्ध करने लगे। उन्होंने अपने दोनों पंखोंसे रावणकी छातीमें चोट की। उनको इस प्रकार प्रहार करते पक्षाभ्यां ताडयामास जटायुस्तस्य वक्षसि। देख रावणने समझ लिया कि 'यह पक्षी बड़ा बलवान् ताडयन्तं तु तं मत्वा बलवानिति रावणः॥ ९४ है।' जब जटायुके मुख और चोंचकी मारसे वह बहुत पीड़ित हो गया, तब उस दुष्टने बड़े वेगसे 'चन्द्रहास' तुण्डचञ्चुप्रहारैस्तु भृशं तेन प्रपीडितः। नामक विशाल खड्ग उठाया और उससे धर्मात्मा जटायुपर तत उत्थाप्य वेगेन चन्द्रहासमसिं महत्॥ ९५ घातक प्रहार किया। इससे उनकी चेतना क्षीण हो गयी और वे पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ९२-९६॥ जघान तेन दुष्टात्मा जटायुं धर्मचारिणम्। निपपात महीपृष्ठे जटायुः क्षीणचेतनः॥ ९६ उस समय उन्होंने रावणसे कहा- 'अरे दुष्टात्मन्! ओ नीच राक्षस ! मुझे तूने नहीं मारा है। मैं तो तेरे उवाच च दशग्रीवं दुष्टात्मन् न त्वया हतः। 'चन्द्रहास' नामक खड्गके प्रभावसे मारा गया हूँ। अरे चन्द्रहासस्य वीर्येण हतोऽहं राक्षसाधम ॥ ९७ मूर्ख ! तेरे सिवा दूसरा कौन शस्त्रधारी योद्धा होगा, जो किसी निहत्थेपर हथियार चलायेगा ? अरे दुष्ट राक्षस ! निरायुधं को हनेन्मूढ सायुधस्त्वामृते जनः। तू यह जान ले कि सीताका हर ले जाना तेरी मौत सीतापहरणं विद्धि मृत्युस्ते दुष्ट राक्षस ॥ ९८ है। दुष्टात्मा रावण ! निस्संदेह श्रीरामचन्द्रजी तेरा वध कर डालेंगे' ॥ ९७-९८१/२ ॥ दुष्ट रावण रामस्त्वां वधिष्यति न संशयः। रुदती दुःखशोकार्ता जटायुं प्राह मैथिली ॥ ९९ जटायुके मारे जानेसे अत्यन्त दुःख और शोकसे पीड़ित हुई मिथिलेशकुमारी सीता उनसे रोकर बोलीं- मत्कृते मरणं यस्मात्त्वया प्राप्तं द्विजोत्तम । 'हे पक्षिराज! तुमने मेरे लिये मृत्युका वरण किया है, तस्माद्रामप्रसादेन विष्णुलोकमवाप्स्यसि ॥ १०० इसलिये तुम श्रीरामचन्द्रजीकी कृपासे विष्णुलोकको प्राप्त होओगे। खगश्रेष्ठ! जबतक श्रीरामचन्द्रजीसे तुम्हारी यावद्रामेण सङ्गस्ते भविष्यति महाद्विज। भेंट न हो, तबतक तुम्हारे प्राण शरीरमें ही रहें।' उन तावत्तिष्ठन्तु ते प्राणा इत्युक्त्वा तु खगोत्तमम् ॥ १०१ पक्षिराजसे यों कहकर अत्यन्त दुःखिनी सीताने अपने शरीरसे धारण किये हुए समस्त आभूषणोंको उतारा ततस्तान्यर्पितान्यङ्गाद्भूषणानि विमुच्य सा। और शीघ्रतापूर्वक वस्त्रमें बाँधकर कहा- 'तुम सब- शीघ्रं निबध्य वस्त्रेण रामहस्तं गमिष्यथ ॥ १०२ के-सब श्रीरामके हाथमें पहुँच जाओगे।' और तब उन्हें भूमिपर गिरा दिया ॥ ९९-१०२१/२॥ इत्युक्त्वा पातयामास भूमौ सीता सुदुःखिता। एवं हृत्वा स सीतां तु जटायुं पात्य भूतले ॥ १०३ इस प्रकार सीताको हरकर तथा जटायुको धराशायी In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth