भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 318 में से

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पृष्ठ 216

अध्याय ४९ ] श्रीरामका जयन्तको दण्ड देना; शरभङ्ग, सुतीक्ष्ण और अगस्त्यसे मिलना २०५ वनानि सर्वाणि विशोध्य राघवो उस समय श्रीरामचन्द्रजीने सारे वनोंको छान गिरीन् समस्तान् गिरिसानुगोचरान्। डाला, समस्त पर्वतों तथा उनकी चोटियोंपर तथा मुनीनामपि चाश्रमान् बहून्- जानेवाले मार्गोंका भी निरीक्षण कर लिया। इसी स्तृणादिवल्लीगहनेषु भूमिषु॥ ११७ प्रकार उन्होंने मुनियोंके बहुत-से आश्रम भी देखे; तृण एवं लताओंसे आच्छादित वनस्थलियों तथा नदीतटे भूविवरे गुहायां खुले मैदानोंमें, नदीके किनारे, गड्ढोंमें और कन्दराओंमें निरीक्षमाणोऽपि महानुभावः। देखनेपर भी जब उन महानुभावको अपनी प्रिया प्रियामपश्यन् भृशदुःखितस्तदा सीताका पता नहीं लगा, तब वे बहुत दुःखी हुए। जटायुषं वीक्ष्य च घातितं नृपः॥ ११८ उसी समय राजा रामचन्द्रजीने रावणद्वारा मारे गये जटायुको देखा और कहा—'अहो! आपको किसने अहो भवान् केन हतस्त्वमीदृशीं मारा? आह! आप ऐसी दुर्दशाको पहुँच चुके हैं? दशामवाप्तोऽसि मृतोऽसि जीवसि। पता नहीं, जीवित हैं या मर गये। पत्नीके ममाद्य सर्वं समदुःखितस्य भोः वियोगवश आपके समान ही दुःखी होकर यहाँ पत्नीवियोगादिह चागतस्य वै॥ ११९ आये हुए मुझ रामके लिये आजकल आप ही सब कुछ थे'॥ ११७—११९॥ इत्युक्तमात्रे विहगोऽथ कृच्छ्रा- भगवान् रामके इतना कहते ही वह पक्षी उस दुवाच वाचं मधुरां तदानीम्। समय बड़े कष्टसे मधुर वाणीमें बोला—'राजन्! इस शृणुष्व राजन् मम वृत्तमत्र समय मैंने जो कुछ देखा है और तत्काल ही वदामि दृष्टं च कृतं च सद्यः॥ १२० उसके लिये जो कुछ किया है, वह मेरा सारा वृत्तान्त आप सुनें। दशमुख रावणने मायासे सीताका दशाननस्तामपनीय मायया अपहरण करके उसे उत्तम विमानपर चढ़ा लिया सीतां समारोप्य विमानमुत्तमम्। और आकाशमार्गसे वह दक्षिण दिशाकी ओर चल जगाम खे दक्षिणदिङ्मुखोऽसौ दिया। उस समय माता सीता बड़े दुःखके साथ सीता च माता विललाप दुःखिता॥ १२१ विलाप कर रही थीं। रघुनन्दन! सीताकी आवाज सुनकर मैंने उन्हें अपने ही बलसे छुड़ानेके लिये आकर्ण्य सीतास्वनमागतोऽहं रावणके साथ महान् युद्ध छेड़ दिया। फिर उस सीतां विमोक्तुं स्वबलेन राघव। राक्षसने अपनी तलवारके बलसे मुझे मार डाला। युद्धं च तेनाहमतीव कृत्वा विदेहकुमारी सीताके ही आशीर्वादसे मैं अभीतक हतः पुनः खड्गबलेन रक्षसा॥ १२२ जीवित था, अब यहाँसे स्वर्गलोकको जाऊँगा। पृथ्वीपालक राम! आप शोक न कीजिये, अब तो वैदेहिवाक्यादिह जीवता मया उस दुष्ट राक्षसको उसके गणोंसहित मार ही दृष्टो भवान् स्वर्गमितो गमिष्ये। डालिये'॥ १२०—१२३॥ मा राम शोकं कुरु भूमिपाल जटायुके यों कहनेपर श्रीरामने पुनः जह्यद्य दुष्टं सगणं तु नैर्ऋतम्॥ १२३ शोकपूर्वक उनसे कहा—'पक्षिराज! आपका रामो जटायुषेत्युक्तः पुनस्तं चाह शोकतः। कल्याण हो और आपको उत्तम गति मिले।' स्वस्त्यस्तु ते द्विजवर गतिस्तु परमास्तु ते॥ १२४ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

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