संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 24, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५ ] रुद्र आदि सर्गों और अनुसर्गोंका वर्णन; दक्ष प्रजापतिकी कन्याओंकी संततिका विस्तार २१ षष्टिं दक्षोऽसृजत् कन्या वीरण्यामिति नः श्रुतम्। ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश॥ ४० सप्तविंशति सोमाय चतस्रोऽरिष्टनेमिने। द्वे चैव बहुपुत्राय द्वे चैवाङ्गिरसे तथा॥ ४१ द्वे कृशाश्वाय विदुषे तदपत्यानि मे शृणु। विश्वेदेवांस्तु विश्वा या साध्या साध्यानसूत॥ ४२ मरुत्वत्यां मरुत्वन्तो वसोस्तु वसवः स्मृताः। भानोस्तु भानवो देवा मुहूर्तायां मुहूर्तजाः ॥ ४३ लम्बायाश्चैव घोषाख्यो नागवीथिश्च जामिजा। पृथिवीविषयं सर्वमरुन्धत्यामजायत॥ ४४ संकल्पायाश्च संकल्पः पुत्रो जज्ञे महामते। ये त्वनेकवसुप्राणा देवा ज्योतिःपुरोगमाः ॥ ४५ वसवोऽष्टौ समाख्यातास्तेषां नामानि मे शृणु। आपो ध्रुवश्च सोमश्च धर्मश्चैवानिलोऽनलः ॥ ४६ प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः। तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ४७ साध्याश्च बहवः प्रोक्तास्तत्पुत्राश्च सहस्रशः। कश्यपस्य तु भार्या यास्तासां नामानि मे शृणु। अदितिर्दितिर्दिनुश्चैव अरिष्टा सुरसा खसा॥ ४८ सुरभिर्विनता चैव ताम्रा क्रोधवशा इरा। कद्रूर्मुनिश्ध धर्मज्ञ तदपत्यानि मे शृणु॥ ४९ हमने सुना है कि दक्ष प्रजापतिने वीरण-कन्या असिक्नीके गर्भसे साठ कन्याएँ उत्पन्न कीं। उनमेंसे दस कन्याएँ उन्होंने धर्मको और तेरह कश्यप मुनिको ब्याह दीं*। फिर सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमाको, चार अरिष्टनेमिको, दो बहुपुत्रको, दो अङ्गिराको और दो कन्याएँ विद्वान् कृशाश्वको समर्पित कर दीं। अब इन सबकी संतानोंका वर्णन सुनिये॥ ३६—४१ १/२॥ जो विश्वा नामकी कन्या थी, उसने विश्वेदेवोंको और साध्याने साध्योंको जन्म दिया। मरुत्वतीके मरुत्वान् (वायु), वसुके वसुगण, भानुके भानुदेवता और मुहूर्ताके मुहूर्ताभिमानी देवगण हुए। लम्बासे घोष नामक पुत्र हुआ, जामिसे नागवीथि नामवाली कन्या हुई और अरुन्धतीसे† पृथिवीके समस्त प्राणी उत्पन्न हुए। महाबुद्धे! संकल्पा नामक कन्यासे संकल्पका जन्म हुआ, अनेक प्रकारके वसु (तेज अथवा धन) ही जिनके प्राण हैं, ऐसे जो आठ ज्योतिर्मय वसु देवता कहे गये हैं, उनके नाम सुनिये—आप, ध्रुव, सोम, धर्म, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास—ये 'आठ वसु' कहलाते हैं। इनके पुत्रों और पौत्रोंकी संख्या सैकड़ों और हजारोंतक पहुँच गयी है॥ ४२-४७॥ इसी प्रकार साध्यगणोंकी भी संख्या बहुत है और उनके भी हजारों पुत्र हैं। जो (दक्ष-कन्याएँ) कश्यप मुनिकी पत्नियाँ हुईं, उनके नाम सुनिये—वे अदिति, दिति, दनु, अरिष्टा, सुरसा, खसा, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इरा, कद्रू और मुनि थीं। धर्मज्ञ! अब आप मुझसे उनकी संतानोंका विवरण सुनिये।
- पाँचवें अध्यायके श्लोक बाईसमें यह चर्चा आयी है कि स्वायम्भुव मनुने प्रजापतिको अपनी पुत्री प्रसूति ब्याह दी थी। उसके गर्भसे दक्षने चौबीस कन्याएँ उत्पन्न कीं, जिनमेंसे तेरह कन्याओंका विवाह उन्होंने धर्मके साथ कर दिया था। फिर इसी अध्यायके उन्तालीस-चालीस श्लोकोंमें यह बात आती है कि दक्षने वीरण प्रजापतिकी पुत्री असिक्नीके साथ विवाह किया, जिसके गर्भसे उन्होंने साठ कन्याएँ उत्पन्न कीं, जिनमेंसे दसका विवाह उन्होंने धर्मके साथ किया था। एक ही दक्षके विषयमें ये दो प्रकारकी बातें आपाततः संदेह उत्पन्न करती हैं। विष्णुपुराणमें भी यह प्रसंग आया है। अध्याय सातके उन्नीससे चौबीसवें श्लोकतक तथा अध्याय पंद्रहके उक्त दोनों प्रसंगोंका स्पष्ट उल्लेख मिलता है। एक सौ तीनवें श्लोकमें उन प्रसंगोंके पर्यालोचनसे यह प्रतीत होता है कि उक्त दोनों दक्ष दो व्यक्ति थे और दोनों दो कालमें उत्पन्न हुए थे। पहले दक्ष ब्रह्माजीके मानस-पुत्र थे और दूसरे प्रचेताओँके पुत्र। इतनेपर भी मैत्रेयजीने यह प्रश्न उठाया है कि 'ब्रह्माजीके पुत्र दक्ष प्रचेताओँके पुत्र कैसे हो गये?' वहाँ पराशरजीने यह समाधान किया है कि 'युगे युगे भवन्त्येते दक्षाद्या मुनिसत्तम।' इस प्रकार युगभेदसे दोनों प्रसंगोंकी संगति बैठायी गयी है। वही समाधान यहाँ भी समझ लेना चाहिये। † यहाँ 'अरुन्धती' की जगह 'मरुत्वती' पाठ भी मिलता है, परंतु वह असंगत है। 'मरुत्वत्यां मरुत्वन्तः' कहकर मरुत्वतीकी संततिका वर्णन आ चुका है। अतः यहाँ 'अरुन्धती' पाठ ही ठीक है; अन्यत्र धर्मकी नवीं पत्नीका नाम नहीं मिलेगा। विष्णुपुराण १५।१०९वें श्लोकमें भी 'अरुन्धत्याम्' ही पाठ है। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth