संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 257, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें२४६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५५ मार्कण्डेय उवाच वामनेन स विद्धाक्षो बहुतीर्थेषु भार्गवः। जाह्नवीसलिले स्थित्वा देवमभ्यर्च्य वामनम्॥ २ ऊर्ध्वबाहुः स देवेशं शंखचक्रगदाधरम्। हृदि संचिन्त्य तुष्टाव नरसिंहं सनातनम्॥ ३ शुक्र उवाच नमामि देवं विश्वेशं वामनं विष्णुरूपिणम्। बलिदर्पहरं शान्तं शाश्वतं पुरुषोत्तमम्॥ ४ धीरं शूरं महादेवं शङ्खचक्रगदाधरम्। विशुद्धं ज्ञानसम्पन्नं नमामि हरिमच्युतम्॥ ५ सर्वशक्तिमयं देवं सर्वगं सर्वभावनम्। अनादिमजरं नित्यं नमामि गरुडध्वजम्॥ ६ सुरासुरैर्भक्तिमद्भिः स्तुतो नारायणः सदा। पूजितं च हृषीकेशं तं नमामि जगद्गुरुम्॥ ७ हृदि संकल्प्य यद्रूपं ध्यायन्ति यतयः सदा। ज्योतिरूपमनौपम्यं नरसिंहं नमाम्यहम्॥ ८ न जानन्ति परं रूपं ब्रह्माद्या देवतागणाः। यस्यावताररूपाणि समर्च्चन्ति नमामि तम्॥ ९ एतत्समस्तं येनादौ सृष्टं दुष्टवधात्पुनः। त्रातं यत्र जगल्लीनं तं नमामि जनार्दनम्॥ १० भक्तैरभ्यर्चितो यस्तु नित्यं भक्तप्रियो हि यः। तं देवममलं दिव्यं प्रणमामि जगत्पतिम्॥ ११ दुर्लभं चापि भक्तानां यः प्रयच्छति तोषितः। तं सर्वसाक्षिणं विष्णुं प्रणमामि सनातनम्॥ १२ श्रीमार्कण्डेय उवाच इति स्तुतो जगन्नाथः पुरा शुक्रेण पार्थिव। प्रादुर्बभूव तस्याग्रे शङ्खचक्रगदाधरः॥ १३ उवाच शुक्रमेकाक्षं देवो नारायणस्तदा। किमर्थं जाह्नवीतीरे स्तुतोऽहं तद्ब्रवीहि मे॥ १४ मार्कण्डेयजी बोले—वामनजीके द्वारा जब आँख छेद दी गयी, तब भृगुनन्दन शुक्राचार्यजीने बहुत तीर्थोंमें भ्रमण किया। फिर एक जगह गङ्गाजीके जलमें खड़े हो भगवान् वामनकी पूजा की और अपनी बाँहें ऊपर उठाकर शङ्ख-चक्र-गदाधारी सनातन देवेश्वर भगवान् नरसिंहका मन-ही-मन ध्यान करते हुए वे उनकी स्तुति करने लगे॥ २-३॥ शुक्राचार्यजी बोले—मैं सम्पूर्ण विश्वके स्वामी और श्रीविष्णुके अवतार उन देवदेव वामनजीको नमस्कार करता हूँ, जो बलिक अभिमान चूर्ण करनेवाले, परम शान्त, सनातन पुरुषोत्तम हैं। जो धीर हैं, शूर हैं, सबसे बड़े देवता हैं, शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले हैं, उन विशुद्ध एवं ज्ञानसम्पन्न भगवान् अच्युतको मैं नमस्कार करता हूँ। जो सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापक और सबको उत्पन्न करनेवाले हैं, उन जरारहित, अनादिदेव भगवान् गरुडध्वजको मैं प्रणाम करता हूँ। देवता और असुर सदा ही जिन नारायणकी भक्तिपूर्वक स्तुति किया करते हैं, उन सर्वपूजित जगद्गुरु भगवान् हृषीकेशको मैं नमस्कार करता हूँ। यतिजन अपने अन्तःकरणमें भावनाद्वारा स्थापित करके जिनके स्वरूपका सदा ध्यान करते रहते हैं, उन अतुलनीय एवं ज्योतिर्मय भगवान् नृसिंहको मैं प्रणाम करता हूँ। ब्रह्मा आदि देवतागण जिनके परमार्थ स्वरूपको भलीभाँति नहीं जानते, अतः जिनके अवताररूपोंका ही वे सदा पूजन किया करते हैं, उन भगवान्को मैं नमस्कार करता हूँ। जिन्होंने प्रथम इस सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि की थी, फिर जिन्होंने दुष्टोंका वध करके इसकी रक्षा की है तथा जिनमें ही यह सारा जगत् लीन हो जाता है, उन भगवान् जनार्दनको मैं प्रणाम करता हूँ। भक्तजन जिनका सदा अर्चन करते हैं तथा जो भक्तोंके प्रेमी हैं, उन परम निर्मल, दिव्य कान्तिमय जगदीश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो प्रसन्न होनेपर अपने भक्तोंको दुर्लभ वस्तु भी प्रदान करते हैं, उन सर्वसाक्षी सनातन विष्णुभगवान्को मैं प्रणाम करता हूँ॥ ४—१२॥ श्रीमार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! पूर्वकालमें शुक्राचार्यजीके द्वारा इस प्रकार स्तुति की जानेपर शङ्ख-चक्र-गदाधारी भगवान् जगन्नाथ उनके समक्ष प्रकट हो गये। उस समय भगवान् नारायणने एक आँखवाले शुक्राचार्यजीसे कहा—'ब्रह्मन्! तुमने गङ्गातटपर किसलिये मेरा स्तवन किया है? यह मुझसे बताओ'॥ १३-१४॥ In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth