संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ
पृष्ठ 259, कुल 318 में से
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२४८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५६
खात्वा पुरुषमात्रं तु बाहुद्वयमथापि वा। | करे। एक पुरुषके बराबर अर्थात् साढ़े तीन हाथ अथवा पूरयेच्छुद्धमृद्भिस्तु जलाक्तैः शर्करान्वितैः॥ ४ | दो हाथ नीचेतक नींव खोदकर उसमें जलसे भीगी हुई | कंकड़ और बालूसहित शुद्ध मिट्टी भर दे। राजन्! फिर अधिष्ठानं ततो बुद्ध्वा पाषाणेष्टकमृण्मयम्। | उसे ही आधार समझकर उसके ऊपर अपनी शक्तिके प्रासादं कारयेत्तत्र वास्तुविद्याविदा नृप॥ ५ | अनुसार पत्थर, ईंट अथवा मिट्टीसे गृहनिर्माण-विद्यामें | कुशल कारीगरोंके द्वारा मन्दिर तैयार कराये। वह मन्दिर चतुरस्रं सूत्रमार्गे चतुःकोणं समन्ततः। | चारों ओरसे बराबर और चौकोर हो। उसकी दीवार शिलाभित्तिकमुत्कृष्टं तदलाभेष्टकामयम्॥ ६ | पत्थरकी हो तो बहुत उत्तम; पत्थर न मिलनेपर ईंटोंकी | ही दीवार बनवा ले। यदि ईंटें भी न मिल सकें तो तदलाभे तु मृत्कुड्यं पूर्वद्वारं सुशोभनम्। | मिट्टीकी ही भींत उठा ले। मन्दिर बहुत ही सुन्दर हो और जातिकाष्ठमयैः स्तम्भैस्तल्लग्नैः फलदान्वितैः॥ ७ | उसका दरवाजा पूर्वकी ओर होना चाहिये। उस मन्दिरमें | अच्छी जातिवाले काठके खंभे लगे हों और उनमें चित्रकला उत्पलैः पद्मपत्रैश्च पातितैश्चित्रशिल्पिभिः। | जाननेवाले शिल्पियोंके द्वारा फलयुक्त वृक्ष, कुमुद तथा इत्थं तु कारयित्वा हि हरेर्वेश्म सुशोभनम्॥ ८ | कमलदल चित्रित कराने चाहिये॥ २—७१/२॥ | नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार जिसमें सुन्दर किवाड़ लगे हों और पूर्वद्वारं नृपश्रेष्ठ सुकपाटं सुचित्रितम्। | जिसका द्वार पूर्व दिशाकी ओर हो—ऐसा बेल-बूटोंसे अतिवृद्धातिबालैस्तु कारयेन्नाकृतिं हरेः॥ ९ | भलीभाँति चित्रित भगवान्का परम सुहावना मन्दिर बनवाकर | बुद्धिमान् एवं हृष्टपुष्ट शरीरवाले पुरुषके द्वारा विश्वकर्माकी कुष्ठाद्युपहतैर्वापि अन्यैर्वा दीर्घरोगिभिः। | बतायी हुई पद्धतिके अनुसार पुराणोक्त दिव्य प्रतिमाका विश्वकर्मोक्तमार्गेण पुराणोक्तां नृपोत्तम॥ १० | निर्माण कराये। जो कारीगर अत्यन्त बूढ़ा या बालक अथवा | कोढ़ आदि रोगोंसे दूषित या पुराना रोगी हो, उससे कारयेत् प्रतिमां दिव्यां पुष्टाङ्गेन तु धीमता। | भगवत्प्रतिमाका निर्माण नहीं कराना चाहिये। प्रतिमाका मुख सौम्याननां सुश्रवणां सुनासां च सुलोचनाम्॥ ११ | सौम्य (प्रसन्न) तथा कान, नाक और नेत्र आदि अङ्ग सुढार | होने चाहिये। उसकी दृष्टि न तो बहुत नीची हो, न बहुत नाधोदृष्टिं नोर्ध्वदृष्टिं तिर्यग्दृष्टिं न कारयेत्। | ऊँची हो और न तिरछी ही हो। विद्वान् पुरुष ऐसी प्रतिमा कारयेत् समदृष्टिं तु पद्मपत्रायतेक्षणाम्॥ १२ | बनवाये, जिसकी दृष्टि सम हो और जिसके नेत्र कमलदलके | समान विशाल हों। भौंहें, ललाट और कपोल सुन्दर हों, सुभ्रुवं सुललाटां च सुकपोलां समां शुभाम्। | उसका समस्त विग्रह सुडौल और सौम्य हो। उसके दोनों बिम्बोष्ठीं सुष्ठुचिबुकां सुग्रीवां कारयेद्बुधः॥ १३ | ओठ लाल हों, ठोढ़ी (अधरके नीचेका भाग) मनोहर तथा | कण्ठ सुन्दर हो। प्रतिमाकी भुजाएँ चार होनी चाहिये—दो उपबाहुकरे देयं दक्षिणे चक्रमर्कवत्। | भुजाएँ और दो उपभुजाएँ। उनमेंसे दाहिनी उपभुजाके हाथमें नाभिसंलग्नदिव्यारं परितो नेमिसंयुतम्॥ १४ | सूर्यके समान आकारवाला चक्र धारण कराना चाहिये। | चक्रकी नाभिके चारों ओर दिव्य अरे हों और उनके भी वामपार्श्वेत्युपभुजे देयं शङ्खं शशिप्रभम्। | ऊपर सब ओरसे नेमि (हाल) लगी हो। बायीं उपभुजाके पाञ्चजन्यमिति ख्यातं दैत्यदर्पहरं शुभम्॥ १५ | हाथमें चन्द्रमाके समान श्वेत कान्तिमय पाञ्चजन्य नामक | शंख देना चाहिये, जो दैत्योंके मदको चूर्ण करनेवाला और | कल्याणप्रद है॥ ८—१५॥
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