संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 26, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६ ] अगस्त्य तथा वसिष्ठजीके मित्रावरुणके पुत्ररूपमें उत्पन्न होनेका प्रसङ्ग २३ सर्गानुसर्गौ कथितौ मया ते युक्त होता है। ब्रह्मन् ! सृष्टि-विस्तारके लिये ब्रह्मा तथा समासतः सृष्टिविवृद्धिहेतोः। अन्य प्रजापतियोंद्वारा जो सर्ग और अनुसर्ग सम्पादित पठन्ति ये विष्णुपराः सदा नरा हुए, उन सबको मैंने संक्षेपसे आपको बता दिया। जो द्विजाति मानव भगवान् विष्णुमें मन लगाकर इन इदं द्विजास्ते विमला भवन्ति ॥ ६७ प्रसङ्गोंको सदा पढ़ेंगे वे निर्मल हो जायेंगे ॥ ६२-६७ ॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे सृष्टिकथने पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणके सृष्टिवर्णनमें पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥ छठा अध्याय अगस्त्य तथा वसिष्ठजीके मित्रावरुणके पुत्ररूपमें उत्पन्न होनेका प्रसङ्ग सूत उवाच सूतजी बोले—ब्रह्मन् ! परमात्मा भगवान् विष्णुसे जिस सृष्टिस्ते कथिता विष्णोर्मायास्य जगतो द्विज। प्रकार देव, दानव और यक्ष आदि उत्पन्न हुए, वह जगत्की देवदानवयक्षाद्या यथोत्पन्ना महात्मनः॥ १ सृष्टिका वृत्तान्त मैंने आपसे कह दिया। अब ऋषियोंके यमुद्दिश्य त्वया पृष्टः पुराहमृषिसंनिधौ। निकट जिस उद्देश्यको लेकर पहले आपने मुझसे प्रश्न मित्रावरुणपुत्रत्वं वसिष्ठस्य कथं त्विति॥ २ किया था कि 'वसिष्ठजी मित्रावरुणके पुत्र कैसे हो गये ?' उसी तदिदं कथयिष्यामि पुण्याख्यानं पुरातनम्। पुरातन पवित्र कथाको कहूँगा। भरद्वाजजी ! आप एकाग्रचित्त शृणुष्वैकाग्रमनसा भरद्वाज विशेषतः॥ ३ हो, विशेष सावधानीके साथ उसे सुनिये ॥ १-३ ॥ सर्वधर्मार्थतत्त्वज्ञः सर्ववेदविदां वरः। सम्पूर्ण धर्म और अर्थोंके तत्त्वको जाननेवाले, पारगः सर्वविद्यानां दक्षो नाम प्रजापतिः॥ ४ समस्त वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ तथा समग्र विद्याओंके पारदर्शी तेन दत्ताः शुभाः कन्याः सर्वाः कमललोचनाः। 'दक्ष' नामक प्रजापतिने अपनी तेरह सुन्दरी कन्याओंको, सर्वलक्षणसम्पूर्णाः कश्यपाय त्रयोदश॥ ५ जो सभी कमलके समान नेत्रोंवाली और समस्त शुभ तासां नामानि वक्ष्यामि निबोधत ममाधुना। लक्षणोंसे सम्पन्न थीं, कश्यप मुनिको दिया था। उनके अदितिर्दितिर्दनुः काला मुहूर्ता सिंहिका मुनिः॥ ६ नाम बतलाता हूँ, आप लोग इस समय मुझसे उनके नाम जान लें—अदिति, दिति, दनु, काला, मुहूर्ता, इरा क्रोधा च सुरभिर्विनता सुरसा खसा। सिंहिका, मुनि, इरा, क्रोधा, सुरभि, विनता, सुरसा, कद्रूश्च सरमा चैव या तु देवशुनी स्मृता॥ ७ खसा, कद्रू और सरमा, जो देवताओंकी कुतिया कही दक्षस्यैता दुहितरस्ताः प्रादात् कश्यपाय सः। गयी हैं—ये सभी दक्ष-प्रजापतिकी कन्याएँ हैं*। तासां ज्येष्ठा वरिष्ठा च अदितिर्नाम्तो द्विज॥ ८ इनको दक्षने कश्यपजीको समर्पित किया था। विप्रवर ! अदिति नामकी जो कन्या थी, वही इन सबमें श्रेष्ठ और अदितिः सुषुवे पुत्रान् द्वादशाग्निसमप्रभान्। बड़ी थी॥ ४-८॥ तेषां नामानि वक्ष्यामि शृणुष्व गदतो मम॥ ९ अदितिने बारह पुत्रोंको उत्पन्न किया†, जो अग्निके समान कान्तिमान् एवं तेजस्वी थे। उन सबके नाम बतला रहा हूँ, आप मुझसे उन्हें सुनें।
- अध्याय पाँचके ४८-४९ श्लोकोंमें कश्यपकी तेरह पत्नियोंके नाम आये हैं। यहाँ पंद्रह नाम आये हैं; इनमें 'मुहूर्ता' और 'सरमा'—ये दो नाम अधिक हैं। 'मुहूर्ता' तो धर्मकी पत्नी थीं। 'सरमा' कश्यपकी पत्नी होनेपर भी दक्षकन्या नहीं थी। इसके अतिरिक्त अरिष्टा एवं ताम्राके स्थानपर यहाँ काला और सिंहिका नाम आये हैं। ये नाम अन्यत्र पुराणोंमें भी आते हैं। † यद्यपि पाँचवें अध्यायके ५१-५२ श्लोकोंमें अदितिकी सन्तानोंका वर्णन आ गया है; अतः यहाँ इस प्रसङ्गकी पुनरुक्ति जान पड़ती है; तथापि इसका समाधान यह है कि वहाँ सृष्टिवर्णनके प्रसङ्गमें वह बात कही गयी है और यहाँ 'वसिष्ठ तथा अगस्त्यजीकी मित्रावरुणके पुत्ररूपमें पुनरुत्पत्ति कैसे हुई ?' इस प्रश्नके समाधानके प्रसङ्गमें मित्र और वरुण देवताका परिचय देना आवश्यक हुआ। वे दोनों बारह आदित्योंमें परिगणित हैं; अतः अदितिके उन बारहौं पुत्रोंका पुनः वर्णन प्रसंगवशात् आ गया है; अतः पुनरुक्ति-दोष नहीं मानना चाहिये। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth