संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 261, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें२५० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५६ [संस्कृत श्लोक] ब्राह्मणान् भोजयित्वा तु विधिवत् षोडशर्त्विजः। चतुर्भिरध्ययनं कार्यं चतुर्भिः पालनं तथा ॥ २९ चतुर्भिस्तु चतुर्दिक्षु होमः कार्यो विचक्षणैः । पुष्पाक्षतान्नमिश्रेण दद्यादिक्षु बलीन् नृप ॥ ३० एकेन दापयेत्तेषामिन्द्राद्याः प्रीयन्तामिति । प्रत्येकं सायंसंध्यायां मध्यरात्रे तथोषसि ॥ ३१ उदिते च ततो दद्यान्मातृविप्रगणाय वा। जपन् पुरुषसूक्तं तु एकतस्तु पुनः पुनः ॥ ३२ एकतो मनसा राजन् विष्णोर्मन्दिरमध्यगः । अहोरात्रोषितो भूत्वा यजमानो द्विजैः सह ॥ ३३ प्रविश्य प्रतिमाद्वारं शुभलग्ने विचक्षणः । देवसूक्तं द्विजैः सार्धमुपस्थाप्य च तां दृढम् ॥ ३४ संस्थाप्य विष्णुसूक्तेन पवमानेन वा पुनः । प्रोक्षयेद्देवदेवेशमाचार्यः कुशवारिणा ॥ ३५ तदग्रे चाग्निमाधाय सम्परिस्तीर्य यत्नतः । जुहुयाज्जातकर्मादि गायत्र्या वैष्णवेन तु ॥ ३६ चतुर्भिराज्याहुतिभिरेकामेकां क्रियां प्रति। आचार्यस्तु स्वयं कुर्यादस्त्रैर्बन्धं च कारयेत् ॥ ३७ त्रातारमिति चैन्द्रयां तु कुर्यादाज्यप्रणुन्नकम् । परोदिवेति याम्यायां वारुण्यां निषसेति च ॥ ३८ या ते रुद्रेति सौम्यां तु हुवेदाज्याहुतीर्नृप। परोमात्रेति सूक्ताभ्यां सर्वत्राज्याहुतीर्नृप ॥ ३९ [हिन्दी अनुवाद] इसके बाद सोलह ऋत्विज् ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक भोजन कराये। उनमेंसे चार ब्राह्मणोंको तो वहाँ वेद-पुराणादिका स्वाध्याय (पाठ) करना चाहिये, चार विप्रोंको उस भगवद्विग्रहकी रक्षामें संलग्न रहना चाहिये तथा चार विद्वानोंको यज्ञमण्डपके भीतर चारों दिशाओंमें हवन करना चाहिये। राजन्! फिर एक ब्राह्मणके द्वारा फूल, अक्षत और अन्नसे समस्त दिशाओंमें बलि अर्पित कराये। यह बलि इन्द्रादि देवताओंकी प्रसन्नताके लिये होती है। प्रत्येक दिशाके अधिपतिको 'इन्द्रः प्रीयताम्' इत्यादि रूपसे उसके नामोच्चारणपूर्वक ही बलि दे। सायंकाल, आधी रात, उषःकाल तथा सूर्योदयके समय प्रत्येक दिक्पालको बलि अर्पित करनी चाहिये। इसके बाद मातृकागणोंको बलि और ब्राह्मणोंको उपहार दे। राजन्! इसके पश्चात् यजमानको चाहिये कि भगवान् विष्णुके मन्दिरमें एक ओर बैठकर एकाग्रचित्तसे बार-बार पुरुषसूक्तका जप करे। फिर पूरे एक दिन-रात उपवास करके शुभ लग्नमें वह बुद्धिमान् पुरुष ब्राह्मणोंको साथ ले मण्डपमें, जहाँ प्रतिमा रखी गयी हो, उस द्वारसे मण्डपके भीतर प्रवेश करे और ब्राह्मणोंके साथ देवसूक्तका पाठ करते हुए भगवत्प्रतिमाका उपस्थान करके उसे मन्दिरमें लाये और विष्णुसूक्त अथवा पवमानसूक्तका पाठ करते हुए उसे वहाँ दृढ़तापूर्वक स्थापित करे। तत्पश्चात् आचार्य कुशयुक्त जलसे उन देवदेवेश्वर भगवान्का अभिषेक करे॥ २९-३५॥ फिर भगवान्के सम्मुख अग्निस्थापन करे। अग्निके चारों ओर यत्नपूर्वक कुशास्तरण करके गायत्री और विष्णुमन्त्रोंद्वारा जातकर्मादि संस्कारकी सिद्धिके निमित्त हवन करे। आचार्यको चाहिये कि प्रत्येक क्रियामें चार-चार बार घीकी आहुति दे तथा अस्त्रमन्त्र (अस्त्राय फट्) बोलकर दिग्बन्ध कराये। 'ॐ त्रातारमिन्द्रम्०' इत्यादि मन्त्र (शु० यजु० २०। ५०)-से अग्निवेदीपर पूर्वकी ओर घीकी आहुति दे। 'परो दिवा०' इत्यादि मन्त्र (शु० यजु० १७। २९)-से दक्षिण दिशामें और 'निषसाद०' इत्यादि मन्त्र (शु० यजु० १०। २७)-से पश्चिममें घृतका हवन करे। हे नृप! 'या ते रुद्र०' (शु० यजु० १६। २)-इस मन्त्रसे उत्तर दिशामें और 'परो मात्रया०' (ऋग्वेद ७। ६। ९९) इत्यादि दो सूक्तोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओंमें घीकी आहुति दे। इस प्रकार विधिवत् हवन करके 'यदस्या०' (शु० यजु० २३। २८) इस In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth