भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 263, कुल 318 में से

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पृष्ठ 263

२५२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५७ सत्तावनवाँ अध्याय * भक्तके लक्षण; हारीत-स्मृतिका आरम्भ; ब्राह्मणधर्मका वर्णन

राजोवाच भक्तानां लक्षणं ब्रूहि नरसिंहस्य मे द्विज। येषां संगतिमात्रेण विष्णुलोको न दूरतः॥ १

राजा बोले—ब्रह्मन्! आप मुझसे भगवान् नृसिंहके भक्तोंका लक्षण बतलाइये, जिनका सङ्ग करनेमात्रसे विष्णुलोक दूर नहीं रह जाता॥ १॥

श्रीमार्कण्डेय उवाच विष्णुभक्ता महोत्साहा विष्ण्वर्चनविधौ सदा। संयता धर्मसम्पन्नाः सर्वार्थान् साधयन्ति ते॥ २ परोपकारनिरता गुरुशुश्रूषणे रताः। वर्णाश्रमाचारयुताः सर्वेषां सुप्रियंवदाः॥ ३ वेदवेदार्थतत्त्वज्ञा गतरोषा गतस्पृहाः। शान्ताश्च सौम्यवदना नित्यं धर्मपरायणाः॥ ३ हितं मितं च वक्तारः काले शक्त्यातिथिप्रियाः। दम्भमायाविनिर्मुक्ताः कामक्रोधविवर्जिताः॥ ५ ईदृग्विधा नरा धीराः क्षमावन्तो बहुश्रुताः। विष्णुकीर्तनसंजातहर्षा रोमाञ्चिता जनाः॥ ६ विष्ण्वर्चापूजने यत्तास्तत्कथायां कृतादराः। ईदृग्विधा महात्मानो विष्णुभक्ताः प्रकीर्तिताः॥ ७

श्रीमार्कण्डेयजीने कहा—राजन्! भगवान् विष्णुके भक्त उनकी पूजा-अर्चा करनेमें महान् उत्साह रखते हैं। वे अपने मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए धर्ममें तत्पर रहकर सारे मनोरथोंको सिद्ध कर लेते हैं। भगवद्भक्त जन सदा परोपकार और गुरु-सेवामें लगे रहते हैं, सबसे मीठे वचन बोलते और अपने-अपने वर्ण तथा आश्रमके सदाचारोंका पालन करते हैं। वे वेद और वेदार्थका तत्त्व जाननेवाले होते हैं, उनमें क्रोध और कामनाओंका अभाव होता है। वे सदा शान्त रहते हैं, उनके मुखपर सौम्यभाव लक्षित होता है तथा वे निरन्तर धर्माचरणमें लगे रहते हैं। थोड़ा किंतु हितकारी वचन बोलते हैं, समयपर अपनी शक्तिके अनुसार सदा अतिथिकी सेवा करनेमें उनका प्रेम बना रहता है। वे दम्भ, कपट, काम और क्रोधसे रहित होते हैं। जो मनुष्य इन पूर्वोक्त लक्षणोंसे युक्त एवं धीर हैं, बहुश्रुत और क्षमावान् हैं तथा विष्णुभगवान्के नामोंका कीर्तन अथवा श्रवण करते समय हर्षसे रोमाञ्चित हो जाते हैं, इसी तरह जो विष्णुपूजनमें तत्पर और भगवत्कथामें आदर रखनेवाले हैं, ऐसे महात्मा पुरुष भगवान् विष्णुके भक्त कहे गये हैं॥ २-७॥

राजोवाच ये वर्णाश्रमधर्मस्थास्ते भक्ताः केशवं प्रति। इति प्रोक्तं त्वया विद्वन् भृगुवर्य गुरो मम॥ ८ वर्णानामाश्रमाणां च धर्मं मे वक्तुमर्हसि। यैः कृतैस्तुष्यते देवो नरसिंहः सनातनः॥ ९

राजा बोले—विद्वन्! भृगुवर्य! मेरे गुरुदेव! आपने अभी कहा है कि जो अपने वर्ण और आश्रमके धर्ममें लगे रहते हैं, वे भगवान् विष्णुके भक्त हैं; अतः आप कृपा करके वर्णों और आश्रमोंके धर्म बताइये, जिनके पालन करनेसे सनातन भगवान् नृसिंह संतुष्ट होते हैं॥ ८-९॥

श्रीमार्कण्डेय उवाच अत्र ते वर्णयिष्यामि पुरावृत्तमनुत्तमम्। मुनिभिः सह संवादं हारीतस्य महात्मनः॥ १० हारीतं धर्मतत्त्वज्ञमासीनं बहुपाठकम्। प्रणिपत्याब्रुवन् सर्वे मुनयो धर्मकाङ्क्षिणः॥ ११

श्रीमार्कण्डेयजीने कहा—इस विषयमें मुनियोंके साथ महात्मा हारीत ऋषिका संवाद हुआ था; उसी प्राचीन एवं उत्तम इतिहासका आज मैं तुम्हारे समक्ष वर्णन करूँगा॥ १०॥ एक समयकी बात है, धर्मका तत्त्व जाननेकी इच्छावाले समस्त मुनियोंने एक जगह आसनपर आसीन, धर्म- तत्त्ववेत्ता एवं बहुपाठी महात्मा हारीत ऋषिके पास जाकर

  • यहाँसे 'हारीत-स्मृति' का प्रारम्भ है। अधुना उपलब्ध 'लघु हारीत स्मृति'के पाठ इसके पाठसे प्रायः मिलते हैं। कुछ-कुछ पाठान्तर भी उपलब्ध होते हैं। In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth