भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 266, कुल 318 में से

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पृष्ठ 266

अध्याय ५८ ] क्षत्रियादि वर्णोंके धर्म और ब्रह्मचर्य तथा गृहस्थाश्रमके धर्मोंका वर्णन २५५ गोरक्षाकृषिवाणिज्यं कुर्याद्वैश्यो यथाविधि। वैश्यको चाहिये कि वह विधिपूर्वक गोरक्षा, कृषि दानधर्मं यथाशक्त्या गुरुशुश्रूषणं तथा॥ ६ और व्यापार करे तथा अपनी शक्तिके अनुसार दानधर्म और गुरुसेवा भी करे। लोभ और दम्भसे सर्वथा दूर रहे, लोभदम्भर्विनिर्मुक्तः सत्यवागनसूयकः। सत्यवादी हो, किसीके दोष न देखे, मन और इन्द्रियोंको स्वदारनिरतो दान्तः परदारविवर्जितः॥ ७ संयममें रखकर परस्त्रीका त्याग करे और अपनी ही स्त्रीमें अनुरक्त रहे। यज्ञ-कालमें शीघ्रतापूर्वक ब्राह्मणोंका धनैर्विप्रान् समर्चेत यज्ञकाले त्वरान्वितः। धनसे सम्मान करे तथा आलस्य छोड़कर प्रतिदिन यज्ञाध्ययनदानानि कुर्यान्नित्यमतन्द्रितः॥ ८ यज्ञ, अध्ययन और दान करता रहे। श्राद्ध-काल प्राप्त पितृकार्यं च तत्काले नरसिंहार्चनं तथा। होनेपर पितृ-श्राद्ध अवश्य करे और नित्यप्रति भगवान् एतद्वैश्यस्य कर्मोक्तं स्वधर्ममनुतिष्ठतः॥ ९ श्रीनृसिंहदेवका पूजन करे। अपने धर्मका पालन करनेवाले वैश्यके लिये यही कर्तव्य कर्म बतलाया गया है। पूर्वोक्त एतदासेवमानस्तु स स्वर्गी स्यान्न संशयः। कर्मका पालन करनेवाला वैश्य निःसंदेह स्वर्गलोकका वर्णत्रयस्य शुश्रूषां कुर्याच्छूद्रः प्रयत्नतः॥१० अधिकारी होता है॥ ६-९ १/२ ॥ दासद्वद्ब्राह्मणानां च विशेषेण समाचरेत्। शूद्रको चाहिये कि वह यत्नपूर्वक इन तीनों अयाचितं प्रदातव्यं कृषिं वृत्त्यर्थमाचरेत्॥ ११ वर्णोंकी सेवा करे और ब्राह्मणोंकी तो दासकी भाँति विशेषरूपसे शुश्रूषा करे। किसीसे माँगकर नहीं, अपनी ग्रहाणां मासिकं कार्यं पूजनं न्यायधर्मतः। ही कमाईका दान करे। जीविकाके लिये कृषि-कर्म धारणं जीर्णवस्त्रस्य विप्रस्योच्छिष्टमार्जनम्॥ १२ करे। प्रत्येक मासमें न्याय और धर्मके अनुसार ग्रहोंका पूजन करे, पुराना वस्त्र धारण करे। ब्राह्मणका जूठा स्वदारेषु रतिं कुर्यात् परदारविवर्जितः। बर्तन माँजे। अपनी स्त्रीमें अनुराग रखे। परस्त्रियोंको पुराणश्रवणं विप्रान्नृसिंहस्य पूजनम्॥ १३ दूरसे ही त्याग दे। ब्राह्मणके मुखसे पुराणकथा श्रवण तथा विप्रनमस्कारं कार्यं श्रद्धासमन्वितम्। करे, भगवान् नरसिंहका पूजन करे। इसी प्रकार सत्यसम्भाषणं चैव रागद्वेषविवर्जनम्॥ १४ ब्राह्मणोंको श्रद्धापूर्वक नमस्कार करे। राग-द्वेष त्याग दे और सत्यभाषण करे। इस प्रकार मन, वाणी, शरीर इत्थं कुर्वन् सदा शूद्रो मनोवाक्कायकर्मभिः। और कर्मसे आचरण करनेवाला शूद्र पापरहित हो स्थानमैन्द्रमवाप्नोति नष्टपापस्तु पुण्यभाक्॥ १५ पुण्यका भागी होता है और मृत्युके पश्चात् इन्द्रलोकको वर्णेषु धर्मा विविधा मयोक्ता प्राप्त होता है॥ १०-१५ ॥ यथाक्रमं ब्राह्मणवर्यसाधिताः। मुनीन्द्रगण! वर्णोंके ये नाना प्रकारके धर्म मैंने आप शृणुध्वमत्राश्रमधर्ममाद्यं लोगोंसे क्रमशः कहे हैं। इन्हें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने बतलाया मयोच्यमानं क्रमशॊ मुनीन्द्राः॥ १६ है। अब मैं क्रमसे प्रथम ब्रह्मचर्य-आश्रमके धर्म बता रहा हूँ, आप लोग सुनें॥ १६ ॥ हारीत उवाच श्रीहारीत मुनि बोले—उपनयन-संस्कार हो जानेके उपनीतो माणवको वसेद्गुरुकुले सदा। बाद ब्रह्मचारी बालक सदा गुरुकुलमें निवास करे। उसको गुरोः प्रियहितं कार्यं कर्मणा मनसा गिरा॥ १७ चाहिये कि मन, वाणी और कर्मसे गुरुका प्रिय और हित In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth