संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 268, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५८ ] क्षत्रियादि वर्णोंके धर्म और ब्रह्मचर्य तथा गृहस्थाश्रमके धर्मोंका वर्णन २५७
आस्तिकोऽहरहः संध्यां त्रिकालं संयतेन्द्रियः । उपासीत यथान्यायं ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ॥ ३१
अभिवाद्य गुरोः पादौ संध्याकर्मावसानतः । यथायोग्यं प्रकुर्वीत मातापित्रोस्तु भक्तितः ॥ ३२
एतेषु त्रिषु तुष्टेषु तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः । तदेषां शासने तिष्ठेद्ब्रह्मचारी विमत्सरः ॥ ३३
अधीत्य चतुरो वेदान् वेदौ वेदमथापि वा। गुरवे दक्षिणां दत्त्वा तदा स्वस्वेच्छया वसेत् ॥ ३४
विरक्तः प्रव्रजेद्विद्वान् संरक्तस्तु गृही भवेत् । सरागो नरकं याति प्रव्रजन् हि ध्रुवं द्विजः ॥ ३५
यस्यैतानि सुशुद्धानि जिह्वोपस्थोदरं गिरः । संन्यसेदकृतोद्वाहो ब्राह्मणो ब्रह्मचर्यवान् ॥ ३६
एवं यो विधिमास्थाय नयेत् कालमतन्द्रितः । तेन भूयः प्रजायेत ब्रह्मचारी दृढव्रतः ॥ ३७
यो ब्रह्मचारी विधिमेतमास्थित- श्ररेत् पृथिव्यां गुरुसेवने रतः । सम्प्राप्य विद्यामपि दुर्लभां तां फलं हि तस्याः सकलं हि विन्दति ॥ ३८
ऋचाका जप करे। ईश्वर और परलोकके अस्तित्वपर विश्वास करता हुआ, ब्रह्मचारियोंके लिये उचित व्रतके पालनमें तत्पर रहकर, जितेन्द्रिय हो, प्रतिदिन न्यायतः प्राप्त त्रिकालसंध्याकी उपासना करे। संध्या-कर्म समाप्त होनेपर गुरुके चरणोंमें प्रणाम करे और यदि सुयोग प्राप्त हो तो माता-पिताके चरणोंमें भी भक्तिपूर्वक प्रणाम करे। इन तीनोंके संतुष्ट होनेपर सम्पूर्ण देवता प्रसन्न रहते हैं; इसलिये ब्रह्मचारीको चाहिये कि डाह छोड़कर इन तीनोंके शासनमें रहे। यथासम्भव चार, दो अथवा एक ही वेदका अध्ययन पूर्ण करके गुरुको दक्षिणा दे। फिर अपने इच्छानुसार कहीं भी निवास करे। यदि वह विद्वान् ब्रह्मचारी विरक्त हो, तब तो संन्यासी हो जाय; किंतु यदि उसका विषय-भोगोंके प्रति अनुराग हो तो गृहस्थाश्रममें प्रवेश करे। द्विजो! रागी पुरुष यदि संन्यासी हो जाय तो वह निश्चय ही नरकमें जाता है। जिसकी जिह्वा, उपस्थ (जननेन्द्रिय), उदर और वाणी शुद्ध हों, अर्थात् जो स्वाद, काम और बुभुक्षाको जीत चुका हो और सत्यवादी या मौन रहता हो, वह पुरुष यदि ब्रह्मचर्यवान् ब्राह्मण हो तो वह विवाह न करके संन्यास ले सकता है॥ २७-३६॥
इस प्रकार जो आलस्य त्यागकर विधिका पालन करते हुए ही समय-यापन करता है, वह ब्रह्मचारी अधिकाधिक दृढ़ व्रतवाला होता है। जो ब्रह्मचारी पूर्वोक्त विधिका सहारा लेकर गुरु-सेवापरायण हो पृथ्वीपर भ्रमण करता है, वह दुर्लभ विद्याको भी सीखकर उसके सम्पूर्ण फलोंको प्राप्त कर लेता है* ॥ ३७-३८ ॥
हारीत उवाच
गृहीतवेदाध्ययनः श्रुतिशास्त्रार्थतत्त्ववित् । गुरोर्दत्तवरः सम्यक् समावर्तनमारभेत् ॥ ३९
असमाननामगोत्रां कन्यां भ्रातृयुतां शुभाम् । सर्वावयवसंयुक्तां सद्वृत्तामुद्वहेत्ततः ॥ ४०
नोद्वहेत्कपिलां कन्यां नाधिकाङ्गीं न रोगिणीम् । वाचालामसतिलोमां च न व्यङ्गां भीमदर्शनाम् ॥ ४१
श्रीहारीत मुनि कहते हैं—पूर्वोक्त रीतिसे वेदाध्ययन समाप्तकर श्रुति तथा अन्यान्य शास्त्रोंके अर्थ एवं तत्त्वका ज्ञान रखनेवाला ब्रह्मचारी विद्वान् गुरुसे आशीर्वाद प्राप्तकर विधिपूर्वक समावर्तन-संस्कार आरम्भ करे। फिर, जिसके नाम और गोत्र अपनेसे भिन्न हों, जिसके भाई भी हो, जो सुन्दरी एवं शुभ लक्षणोंवाली हो, जिसके शरीरके सभी अवयव अविकल हों और जिसका आचरण उत्तम हो, ऐसी कन्याके साथ विवाह करे। जिसके शरीरका रंग कपिल हो, जो अधिकाङ्गी या रोगिणी हो, बहुत बोलनेवाली और अधिक रोमवाली हो, जिसका कोई अङ्ग विकृत या
- इससे आगे 'हारीत उवाच' पुनः दिया गया है। इससे जान पड़ता है, यह अध्याय यहाँ पूर्ण हो गया है।
1113 Narsingpuran_Section_10_In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth