भारतकोश
संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 271, कुल 318 में से

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पृष्ठ 271

२६० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८

स्नानाच्छरीरं संशोध्य कुर्यादाचमनं बुधः। शुभे जले प्रविश्याथ नमेद्वरुणामप्पतिम् ॥ ६६

हरिमेव स्मरंश्चित्ते निमज्जेच्च बहूदके । ततः स्नानं समासाद्य अप आचम्य मन्त्रतः ॥ ६७

प्रोक्षयेद्वरुणं देवं तैर्मन्त्रैः पावमानिभिः । कुशाग्रस्थेन तोयेन प्रोक्ष्यात्मानं प्रयत्नतः ॥ ६८

आलभेन्मृत्तिकां गात्रे इदं विष्णुरिति त्रिधा । ततो नारायणं देवं संस्मरन् प्रविशेज्जलम् ॥ ६९

निमज्यान्तर्जले सम्यक्त्रिः पठेद्घमर्षणम्। स्नात्वा कुशतलैस्तद्वद्देवर्षीन् पितृभिः सह ॥ ७०

तर्पयित्वा जलात्तस्मान्निष्क्रम्य च समाहितः । जलतीरं समासाद्य धौते शुक्ले च वाससी ॥ ७१

परिधायोत्तरीयं च न कुर्यात्केशधूननम् । न रक्तमुल्बणं वासो न नीलं तत्प्रशस्यते ॥ ७२

मलाक्तं तु दशाहीनं वर्जयेदम्बरं बुधः । ततः प्रक्षालयेत्पादौ मृत्तोयेन विचक्षणः ॥ ७३

त्रिः पिबेद्वीक्षितं तोयमास्यं द्विः परिमार्जयेत् । पादौ शिरसि चाभ्युक्ष्येत्रिराचम्य तु संस्पृशेत् ॥ ७४

अङ्गुष्ठेन प्रदेशिन्या नासिकां समुपस्पृशेत् । अङ्गुष्ठकनिष्ठिकाभ्यां नाभौ हृदि तलेन च ॥ ७५

शिरश्चाङ्गुलिभिः सर्वैर्बाहुं चैव ततः स्पृशेत् । अनेन विधिनाऽऽचम्य ब्राह्मणः शुद्धमानसः ॥ ७६

दर्भे तु दर्भपाणिः स्यात् प्राङ्मुखः सुसमाहितः । प्राणायामांस्तु कुर्वीत यथाशास्त्रमतन्द्रितः ॥ ७७


अपने शरीरको यत्नपूर्वक लिप्त करके, शुद्ध स्नानके द्वारा उसे धोकर पुनः आचमन करे। तदनन्तर स्वच्छ जलमें प्रवेश करके जलेश वरुणको नमस्कार करे। फिर मन-ही-मन भगवान् विष्णुका स्मरण करते हुए जहाँ कुछ अधिक जल हो, वहाँ डुबकी लगाये। इसके बाद स्नान समाप्तकर, मन्त्रपाठपूर्वक आचमन करके, वरुणसम्बन्धी पवमान-मन्त्रोंद्वारा वरुणदेवका अभिषेक करे। फिर कुशके अग्रभागपर स्थित जलसे अपना यत्नपूर्वक मार्जन करे और 'इदं विष्णुर्विचक्रमे' इस मन्त्रका पाठ करते हुए अपने शरीरके तीन भागोंमें क्रमशः मृत्तिकाका लेप करे। तत्पश्चात् भगवान् नारायणका स्मरण करते हुए जलमें प्रवेश करे। जलके भीतर भली प्रकार डुबकी लगाकर तीन बार अघमर्षण पाठ करे। इस प्रकार स्नान करके कुश और तिलोंद्वारा देवताओं, ऋषियों और पितरोंका तर्पण करे। इसके बाद समाहितचित्त हो, जलसे बाहर निकल, तटपर आकर धुले हुए दो श्वेत वस्त्रोंको धारण करे। इस प्रकार धोती और उत्तरीय धारणकर अपने केशोंको न फटकारे। अत्यधिक लाल और नील वस्त्र धारण करना भी उत्तम नहीं माना गया है। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि जिस वस्त्रमें मल या दाग लगा हो, अथवा जिसमें किनारी न हो, उसका भी त्याग करे॥ ६२-७२१/२॥

इसके पश्चात् विज्ञ पुरुष मिट्टी और जलसे अपने चरणोंको धोये। फिर खूब देख-भालकर शुद्ध जलसे तीन बार आचमन करे। दो बार जल लेकर मुँह धोये। पैर और सिरपर जल छिड़के। फिर तीन बार आचमन करके क्रमशः अङ्गोंका स्पर्श करे। अँगूठे और तर्जनीसे नासिकाका स्पर्श करे। अङ्गुष्ठ और कनिष्ठिकासे नाभिका स्पर्श करे। हृदयका करतलसे स्पर्श करे। तदनन्तर समस्त अँगुलियोंसे पहले सिरका, फिर बाहुओंका स्पर्श करे। इस प्रकार आचमन करके ब्राह्मण शुद्धहृदय हो, हाथमें कुश ले, पूर्वकी ओर मुख करके एकाग्रतापूर्वक कुशासनपर बैठ जाय और आलस्यको त्यागकर शास्त्रोक्त विधिसे तीन बार प्राणायाम करे॥ ७३-७७॥


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