संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ
पृष्ठ 60, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 60
अध्याय १२ ] यम और यमीका संवाद ४९
यम्युवाच यमी बोली—जो भाई अपनी योग्य बहिनको उसके चाहनेपर भी न चाहे, जो बहिनका पति न हो सके, न भ्राता भगिनीं योग्यां कामयन्तीं च कामयेत्। उसके भाई होनेसे क्या लाभ? जो स्वामीकी इच्छा भ्रातृभूतेन किं तस्य स्वसुर्यो न पतिर्भवेत् ॥ १० रखनेवाली अपनी कुमारी बहिनका स्वामी नहीं बनता, उस भ्राताको ऐसा समझना चाहिये कि वह पैदा ही अभूत इव स ज्ञेयो न तु भूतः कथञ्चन। नहीं हुआ। किसी तरह भी उसका उत्पन्न होना नहीं अनाथां नाथमिच्छन्तीं स्वसारं यो न नाथति ॥ ११ माना जा सकता। भैया ! यदि बहिन अपने भाईको ही अपना स्वामी—अपना पति बनाना चाहती है, इस दशामें काङ्क्षन्तीं भ्रातरं नाथं भर्तारं यस्तु नेच्छति । जो बहिनको नहीं चाहता, वह पुरुष मुनिशिरोमणि ही भ्रातेति नोच्यते लोके स पुमान् मुनिसत्तमः ॥ १२ क्यों न हो, इस संसारमें भ्राता नहीं कहा जा सकता। यदि किसी दूसरेकी ही कन्या उसकी पत्नी हो तो भी स्याच्चान्यतनया तस्य भार्या भवति किं तया। उससे क्या लाभ, यदि उस भाईकी अपनी बहिन उसके ईक्षतस्तु स्वसा भ्रातुः कामेन परिदह्यते ॥ १३ देखते-देखते कामसे दग्ध हो रही है। मेरे होश, इस समय अपने ठिकाने नहीं हैं। मैं इस समय जो काम यत्कार्यमहमिच्छामि त्वमेवेच्छ तदेव हि । करना चाहती हूँ, तुम भी उसीकी इच्छा करो; नहीं तो अन्यथाहं मरिष्यामि त्वामिच्छन्ती विचेतना ॥ १४ मैं तुम्हारी ही चाह लेकर प्राण त्याग दूँगी, मर जाऊँगी। भाई! कामकी वेदना असह्य होती है। तुम मुझे क्यों कामदुःखमसह्यं नु भ्रातः किं त्वं न चेच्छसि । नहीं चाहते? प्यारे भैया ! कामाग्निसे अत्यन्त संतप्त होकर कामाग्निना भृशं तप्ता प्रलीयाम्यङ्ग मा चिरम् ॥ १५ मैं मरी जा रही हूँ; अब देर न करो। कान्त ! मैं कामपीड़िता स्त्री हूँ। तुम शीघ्र ही मेरे अधीन हो जाओ। अपने कामार्तायाः स्त्रियाः कान्त वशगो भव मा चिरम्। शरीरसे मेरे शरीरका संयोग होने दो ॥ १०-१६ ॥ स्वेन कायेन मे कायं संयोजयितुमर्हसि ॥ १६ ॥ यम बोले—बहिन ! सारा संसार जिसकी निन्दा यम उवाच करता है, उसी इस पापकर्मको तू धर्म कैसे बता रही है? भद्रे ! भला कौन सचेत पुरुष यह न करने योग्य पाप- किमिदं लोकविद्विष्टं धर्मं भगिनि भाषसे । कर्म कर सकता है? भामिनि ! मैं अपने शरीरसे तुम्हारे अकार्यमिह कः कुर्यात् पुमान् भद्रे सुचेतनः ॥ १७ शरीरका संयोग न होने दूँगा। कोई भी भाई अपनी काम- पीड़िता बहिनकी इच्छा नहीं पूरी कर सकता। जो बहिनके न ते संयोजयिष्यामि कायं कायेन भामिनि। साथ समागम करता है, उसके इस कर्मको महापातक न भ्राता मदनार्तायाः स्वसुः कामं प्रयच्छति ॥ १८ बताया गया है—शुभे ! यह तिर्यग्-योनिमें पड़े हुए पशुओंका धर्म है—देवता या मनुष्यका नहीं ॥ १७-१९ ॥ महापातकर्मित्याहुः स्वसारं योऽधिगच्छति। पशूनामेष धर्मः स्यात् तिर्यग्योनिवतां शुभे ॥ १९ यमी बोली—भैया ! हम दोनों जुड़वी संतानें हैं और माताके गर्भमें एक साथ रहे हैं। पहले माताके यम्युवाच गर्भमें एक ही स्थानपर हम दोनोंका जो संयोग हुआ था, वह जैसे दूषित नहीं माना गया, उसी प्रकार यह एकस्थाने यथा पूर्वं संयोगो नौ न दुष्यति । संयोग भी दूषित नहीं हो सकता। भाई ! अभीतक मुझे मातृगर्भे तथैवायं संयोगो नौ न दुष्यति ॥ २० पतिकी प्राप्ति नहीं हुई है। तुम मेरा भला करना क्यों नहीं चाहते? 'निर्ऋति' नामक राक्षस तो अपनी बहिनके किं भ्रातरप्यनाथां त्वं मम नेच्छसि शोभनम् । साथ नित्य ही समागम करता है ॥ २०-२१ ॥ स्वसारं निर्ऋती रक्षः संगच्छति च नित्यशः ॥ २१
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