संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 62, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १३ ] पतिव्रताकी शक्ति; उसके साथ एक ब्रह्मचारीका संवाद ५१
व्यास उवाच असकृत् प्रोच्यमानोऽपि तया चैवं दृढव्रतः। कृतवान् न यमः कार्यं तेन देवत्वमाप्तवान् ॥ ३५ नराणां दृढचित्तानामेवं पापमकुर्वताम्। अनन्तं फलमित्याहुस्तेषां स्वर्गफलं भवेत् ॥ ३६ एतत्तु यम्युपाख्यानं पूर्ववृत्तं सनातनम्। सर्वपापहरं पुण्यं श्रोतव्यमनसूयया ॥ ३७ यश्चैतत् पठते नित्यं हव्यकव्येषु ब्राह्मणः। संतृप्ताः पितरस्तस्य न विशन्ति यमालयम् ॥ ३८ यश्चैतत् पठते नित्यं पितृणामनृणो भवेत्। वैवस्वतीभ्यस्तीव्राभ्यो यातनाभ्यः प्रमुच्यते ॥ ३९ पुत्रैतदाख्यानमनुत्तमं मया तवोदितं वेदपदार्थनिश्चितम्। पुरातनं पापहरं सदा नृणां किमन्यदद्यैव वदामि शंस मे ॥ ४०
श्रीव्यासजी कहते हैं— शुकदेव! यमीके बारंबार कहनेपर भी दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले यमने वह पाप-कर्म नहीं किया; इसलिये वे देवत्वको प्राप्त हुए। इस प्रकार स्थिरचित्त होकर पाप न करनेवाले मनुष्योंके लिये अनन्त पुण्यफलकी प्राप्ति बतलायी गयी है। ऐसे लोगोंको स्वर्गरूप फल उपलब्ध होता है। यह यमीका उपाख्यान, जो प्राचीन एवं सनातन इतिहास है, सब पापोंको दूर करनेवाला और पवित्र है। असूया त्यागकर इसका श्रवण करना चाहिये। जो ब्राह्मण देवयाग और पितृयागमें सदा इसका पाठ करता है, उसके पितृगण पूर्णतः तृप्त होते हैं। उन्हें कभी यमराजके भवनमें प्रवेश नहीं करना पड़ता। जो इसका नित्य पाठ करता है, वह पितृऋणसे मुक्त हो जाता है तथा उसे तीव्र यम-यातनाओंसे छुटकारा मिल जाता है। बेटा शुकदेव! मैंने तुमसे यह सर्वोत्तम एवं पुरातन उपाख्यान कह सुनाया, जो वेदके पदों तथा अर्थोंद्वारा निश्चित है। इसका पाठ करनेपर यह सदा ही मनुष्योंका पाप हर लेता है। मुझे बताओ, अब मैं तुम्हें और क्या सुनाऊँ ? ॥ ३५—४० ॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे यमीयमसंवादो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'यमी-यम-संवाद' नामक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥
तेरहवाँ अध्याय पतिव्रताकी शक्ति; उसके साथ एक ब्रह्मचारीका संवाद; माताकी रक्षा परम धर्म है, इसका उपदेश
श्रीशुक उवाच विचित्रेयं कथा तात वैदिकी मे त्वयेरिता। अन्याः पुण्याश्च मे ब्रूहि कथाः पापप्रणाशिनीः ॥ १
व्यास उवाच अहं ते कथयिष्यामि पुरावृत्तमनुत्तमम्। पतिव्रतायाः संवादं कस्यचिद्ब्रह्मचारिणः ॥ २ कश्यपो नीतिमान् नाम ब्राह्मणो वेदपारगः। सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो व्याख्याने परिनिष्ठितः ॥ ३
श्रीशुकदेवजी बोले— तात! आपने जो यह वैदिक कथा मुझे सुनायी है, बड़ी विचित्र है। अब दूसरी पापनाशक कथाओंका मेरे सम्मुख वर्णन कीजिये ॥ १ ॥
व्यासजी बोले— बेटा! अब मैं तुमसे उस परम उत्तम प्राचीन इतिहासका वर्णन करूँगा, जो किसी ब्रह्मचारी और एक पतिव्रता स्त्रीका संवादरूप है। (मध्यदेशमें) एक कश्यप नामक ब्राह्मण रहते थे, जो बड़े ही नीतिज्ञ, वेद-वेदाङ्गोंके पारंगत विद्वान्, समस्त शास्त्रोंके अर्थ एवं तत्त्वके ज्ञाता, व्याख्यानमें प्रवीण,
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