संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 67, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें५६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १४ पुनर्मृतायां भार्यायां भविता त्वं त्रिदण्डकः। फिर तुम अपनी पत्नीकी मृत्युके बाद त्रिदण्डी (संन्यासी) स यत्याश्रमधर्मेण यथोक्त्यानुष्ठितेन च। हो जाओगे। वहाँ संन्यासाश्रमके लिये शास्त्रविहित नरसिंहप्रसादेन वैष्णवं पदमाप्स्यसि॥ ५८ धर्मका यथावत् रूपसे पालन करनेपर भगवान् नरसिंहकी प्रसन्नतासे तुम विष्णुपदको प्राप्त कर लोगे।' तुम्हारे भाव्यमेतत्तु कथितं मया तव हि पृच्छतः। पूछनेपर मैंने ये भविष्यमें होनेवाली बातें तुमसे बतला मन्यसे नानृतं त्वेतत् कुरु सर्वं हि मे वचः॥ ५९ दी हैं। यदि तुम इन्हें असत्य नहीं मानते, तो मेरे सब वचनोंका पालन करो'॥ ५४—५९॥ ब्राह्मण उवाच ब्राह्मण बोला—पतिव्रते! मैं माताकी रक्षाके लिये गच्छामि मातृरक्षार्थमद्यैवाहं पतिव्रते। आज ही जाता हूँ। शुभेक्षणे! वहाँ जाकर तुम्हारी सब करिष्ये त्वद्वचः सर्वं तत्र गत्वा शुभेक्षणे॥ ६० बातोंका मैं पालन करूँगा॥ ६०॥ इत्युक्त्वा गतवान् ब्रह्मन् देवशर्मा ततस्त्वरन्। ब्रह्मन्! यों कहकर देवशर्मा वहाँसे शीघ्रतापूर्वक संरक्ष्य मातरं यत्नात् क्रोधमोहविवर्जितः॥ ६१ चला गया और क्रोध तथा मोहसे रहित होकर उसने यत्न-पूर्वक माताकी रक्षा की। फिर विवाह करके एक कृत्वा विवाहमुत्पाद्य पुत्रं वंशकरं शुभम्। सुन्दर वंशवर्धक पुत्र उत्पन्न किया और कुछ कालके मृतभार्यश्च संन्यस्य समलोष्टाश्मकाञ्चनः। बाद पत्नीकी मृत्यु हो जानेपर संन्यासी होकर ढेले और नरसिंहप्रसादेन परां सिद्धिमवाप्तवान्॥ ६२ मिट्टीको बराबर समझते हुए उसने भगवान् नृसिंहकी पतिव्रताशक्तिरियं तवेरिता कृपासे परमसिद्धि (मोक्ष) प्राप्त कर ली। यह मैंने तुमसे धर्मश्च मातुः परिरक्षणं परम्। पतिव्रताकी शक्ति बतायी और यह भी बतलाया कि संसारवृक्षं च निहत्य बन्धनं माताकी रक्षा करना परम धर्म है। संसारवृक्षका उच्छेद छित्त्वा च विष्णोः पदमेति मानवः॥ ६३ करके सब बन्धनोंको तोड़ देनेपर मनुष्य विष्णुपदको प्राप्त करता है॥ ६१—६३॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे ब्रह्मचारिसंवादो नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥ इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'पतिव्रता और ब्रह्मचारीका संवाद' विषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३॥ चौदहवाँ अध्याय तीर्थसेवन और आराधनसे भगवान्की प्रसन्नता; 'अनाश्रमी' रहनेसे दोष तथा आश्रमधर्मके पालनसे भगवत्प्राप्तिका कथन व्यास उवाच व्यासजी बोले—महाबुद्धिमान् पुत्र शुकदेव! तुम शृणु वत्स महाबुद्धे शिष्याश्चैतां परां कथाम्। और मेरे अन्य शिष्यगण भी मेरे द्वारा कही जानेवाली मयोच्यमानां शृण्वन्तु सर्वपापप्रणाशिनीम्॥ १ इस पापहारिणी कथाको सुनो॥ १॥ पूर्वकालमें कोई वेदशास्त्रविशारद श्रेष्ठ ब्राह्मण अपनी पुरा द्विजवरः कश्चिद्वेदशास्त्रविशारदः। पत्नीकी मृत्यु हो जानेपर तीर्थमें गया और वहाँ उसने मृतभार्यो गतस्तीर्थं चक्रे स्नानं यथाविधि॥ २ विधिपूर्वक स्नान किया और विजन (एकान्त)-में रहकर तपः सुतप्तं विजने निःस्पृहो दारकर्मणि। उत्तम तपस्या की। तत्पश्चात् दारकर्म (विवाह)-की भिक्षाहारः प्रवसितो जपस्नानपरायणः॥ ३ इच्छा न रखकर वह परदेशमें रहता हुआ भिक्षा माँगकर In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth