संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ५ ) अध्याय विषय पृष्ठ-संख्या | अध्याय विषय पृष्ठ-संख्या २७-चन्द्रवंशका वर्णन........................... ९१ | ४६-परशुरामावतारकी कथा .................. १६८ २८-शान्तनुका चरित्र ........................... ९३ | ४७-श्रीरामावतारकी कथा—श्रीरामके जन्मसे २९-शान्तनुकी संततिका वर्णन ............. ९६ | लेकर विवाहतकके चरित्र ............ १७१ ३०-भूगोल तथा स्वर्गलोकका वर्णन..... ९८ | ४८-श्रीराम-वनवास; राजा दशरथका निधन ३१-ध्रुव-चरित्र तथा ग्रह, नक्षत्र एवं पातालका | तथा वनमें राम-भरतकी भेंट ......... १८३ संक्षिप्त वर्णन.................................. १०३ | ४९-श्रीरामका जयन्तको दण्ड देना; शरभङ्ग, ३२-सहस्रानीक-चरित्र; श्रीनृसिंह-पूजनका | सुतीक्ष्ण और अगस्त्यसे मिलना; माहात्म्य ...................................... ११५ | शूर्पणखाका अनादर; सीताहरण; ३३-भगवान्के मन्दिरमें झाडू देने और | जटायुवध और शबरीको दर्शन देना .. १९६ उसको लीपनेका महान् फल—राजा | ५०-सुग्रीवसे मैत्री; वालिवध; सुग्रीवका प्रमाद जयध्वजकी कथा ......................... ११६ | और उसकी भर्त्सना; सीताकी खोज ३४-भगवान् विष्णुके पूजनका फल ...... १२३ | और हनुमान्का लङ्कागमन.............. २०७ ३५-लक्षहोम और कोटिहोमकी विधि | ५१-हनुमान्जीका समुद्र पार करके लङ्कामें तथा फल ................................... १२७ | जाना, सीतासे भेंट और लङ्काका दहन ३६-अवतार-कथाका उपक्रम............... १२९ | करके श्रीरामको समाचार देना ....... २१९ ३७-मत्स्यावतार तथा मधु-कैटभ-वध ... १३० | ५२-श्रीराम आदिका समुद्रतटपर जाना; ३८-कूर्मावतार; समुद्रमन्थन और मोहिनी- | विभीषणकी शरणागति और उन्हें लङ्काके अवतार......................................... १३३ | राज्यकी प्राप्ति; समुद्रका श्रीरामको मार्ग ३९-वाराह-अवतार; हिरण्याक्ष-वध ....... १३७ | देना; पुलद्वारा समुद्र पार करके ४०-नृसिंहावतार; हिरण्यकशिपुकी वरदान- | वानरसेनासहित श्रीरामका सुवेल पर्वतपर प्राप्ति और उससे सताये हुए देवोंद्वारा | पड़ाव डालना; अङ्गदका प्रभाव; भगवान्की स्तुति......................... १३८ | लक्ष्मणकी प्रेरणासे श्रीरामका अङ्गदकी ४१-प्रह्वादकी उत्पत्ति और उनकी हरि- | प्रशंसा करना; अङ्गदके वीरोचित उद्गार भक्तिसे हिरण्यकशिपुकी उद्विग्नता..... १४३ | और दौत्यकर्म; वानर वीरोंद्वारा राक्षसोंका ४२-प्रह्लादपर हिरण्यकशिपुका कोप और | संहार; रावणका श्रीरामके द्वारा युद्धमें प्रह्लादका वध करनेके लिये उसके द्वारा | पराजित होना; कुम्भकर्णका वध; अतिकाय किये गये अनेक प्रयत्न .................. १४८ | आदि राक्षस वीरोंका मारा जाना; ४३-प्रह्लादजीका दैत्यपुत्रोंको उपदेश देना; | मेघनादका पराक्रम और वध; रावणकी हिरण्यकशिपुकी आज्ञासे प्रह्लादका समुद्रमें | शक्तिसे मूर्च्छित लक्ष्मणका हनुमान्जीके डाला जाना तथा वहीं उन्हें भगवान्का | द्वारा पुनर्जीवन; राम-रावण-युद्ध; रावण- प्रत्यक्ष दर्शन होना.......................... १५२ | वध; देवताओंद्वारा श्रीरामकी स्तुति; ४४-नृसिंहका प्रादुर्भाव और हिरण्यकशिपुका | सीताके साथ अयोध्यामें आनेपर वध ............................................. १६० | श्रीरामका राज्याभिषेक और अन्तमें ४५-वामन-अवतारकी कथा.................. १६४ | पुरवासियोंसहित उनका परमधाम गमन २२४
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