भारतकोश
निराले सद्गुरु

निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

साहिब बन्दगी द्वारा

स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (उद्गम)

DevanagariHindipublished112 पृष्ठ

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कौन है काल पुरुष व परम पुरुष ?

आओ इस भेद को थोड़ा समझें !

‘‘वेद चारों नाहिं जानत, सत्य पुरुष कहानियाँ॥’’

धर्म दास के पूछने पर आदि उत्पति का रहस्य संसार को सब से पहले कबीर साहिब जी ने दिया। आप ने कहा सत्य पुरुष पहले गुप्त और अकेले थे। वे कभी बने ही नहीं, न ही कभी मिटेंगे। जिस वस्तु का सर्जन होता है वह नष्ट भी अवश्य होती है। कबीर साहिब कहते हैं मैं तब की बात कहता हूँ जब साकार, निराकार, लोक-लोकांतर, सूर्य, चांद, तारे, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, काल निरंजन (मन) भी नहीं बना था।

सब से पहले उस गुप्त, अगम पुरुष ने अपनी इच्छा से शब्द उचारा। जिस से अद्भुत श्वेत प्रकाश उत्पन्न हुआ, जो इस संसारी प्रकाश जैसा नहीं था। जिस का एक-एक कण करोड़ों सूर्यों को भी लज्जा दे। अगम पुरुष स्वयं उस प्रकाश में समा गये और वह प्रकाश जीवित हो गया। अगम पुरुष जो पहले गुप्त थे, प्रकाश में आने से उनको सत्य पुरुष, परम पुरुष, दयाल पुरुष कहा गया। वो ही अमर लोक सतलोक कहलाया।

फिर उन्होंने अपनी मौज से अपने ही स्वरूप को अपने में से शटका दिया, अनन्त बूंदें हुई। जो वापस उस अद्भुत अनन्त प्रकाश में आई। लेकिन उनका अपना अलग वजूद रहा वो उस अद्भुत अनन्त प्रकाश में मिक्स नहीं हो पाई। क्योंकि सत्यपुरुष ने इच्छा की कि इनका अलग अस्तित्व रह जाये। वे ही जीव (आत्मा) कहलाई। वे सब जीव उसी प्रकाश में विचरण करने लगे जैसे पानी में मछली। अमर लोक में आत्मा का प्रकाश सोलह सूर्य जितना है।

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